Sunday, August 9, 2009

गाँधी का राम राज्य

गाँधी के राम राज्य की अवधारणा तुलसी कृत राम चरित मानस से ली गई है जिसका सार इस बात में निहित है कि राजा को एक न्याय प्रिय , चरित्रवान , प्रजा को अपने प्राणों से भी प्रिय मानने वाला और नैतिक होना चाहिए । जिस राजा की प्रजा को दुःख हो वह निश्चित रूप से अयोग्य और दंड पाने का पात्र है। अच्छे राज -काज और प्रजा के सुख के लिए राजा को पुरुषोत्तम होना ही चाहिए , तब सब कुछ ठीक ही होगा ।
राम राज्य में आपस में लोग वैर नही करते ; सभी कर्तब्य - परायण हैं ; अपना अपना नियत काम करते हैं । किसी को दैहिक , दैविक और भौतिक पीड़ा नही है । सभी स्वधर्म , परस्पर प्रीति , वेद और नीति रत हैं , अल्प -आयु में किसी की मृत्यु नही होती , सभी सुंदर , स्वस्थ्य और सुखी हैं । कोई भी दरिद्र , दीन और दुखी नही है ।नर-नारी सभी लोग गुणी , चतुर , विनम्र , ज्ञानी और कर्म - कुशल हैं ; सभी कृतज्ञ हैं चतुर -कपटी नही हैं । राम राज की सुख -संपदा अवर्णनीय है । सभी नर-नारी उदार , परोपकारी ; पुरूष एकपत्नी -व्रती और स्त्रियाँ मन वचन और कर्म से पति - हितकारी हैं ।
श्री राम चन्द्र के राज्य में ' दंड ' नाम की चीज अगर कहीं है तो केवल सन्यासियों के हाथ में और ' भेद ' केवल नृत्य -समाज में ही देखा जाता है । ' जीतो ' शब्द का प्रयोग केवल मन को जीतने के लिए ही किया जाता है ।
फसलें अच्छी होती हैं क्योंकि समय पर वर्षा और धूप होती है । कोई प्राकृतिक आपदा जैसे सूखा , बाढ़ , तूफान और भूचाल आदि कभी नही आते । सभी नदी , पहाड़ , वन , खान सम्पदा आदि आदि अनुकूल ही रहते हैं , सो सभी सुखी , संपन्न और राम भक्त हैं ।
इस प्रकरण में इस बात पर जोर दिया है कि यथा राजा तथा प्रजा । राजा के गुण उसी रूप में प्रजा तक प्रर्दशित होते हैं । पातंजल योग दर्शन भी इस सिद्धांत का प्रतिपादन करता है ।
----राम चरित मानस के उत्तर कांड में वर्णित राम राज्य पर आधारित ।
कृपया तुलसी दास कृत '' राम चरित मानस '' पढ़ें ।

Saturday, August 1, 2009

राम चरित मानस से . - ज्ञान सार .

श्रृष्टि में मनुष्य से उत्तम कोई प्राणी/ जीव नही है । दरिद्रता के सामान कोई दुःख नही है । मन -बचन -कर्म से जो दूसरों की भलाई करे वही संत / सज्जन है । संत दूसरों के हित के लिए और दुष्ट दूसरों के दुःख के लिए कष्ट सहते हैं जैसे भोज का बृक्ष लिखने के लिए अपनी खाल उतार देता है परन्तु सन दूसरे को बंधने के लिए अपनी खाल उतरवाकर बहुत कष्ट सह कर रस्सी बन जाता है । दुष्ट बिना किसी अपने स्वार्थ सधे स्वभाव वश दूसरों को दुःख देते हैं । कहा गया कि संत का ह्रदय नवनीत / माखन की तरह तरल होता है परन्तु ठीक से नही कहा ; नवनीत तपाने से पिघलता है परन्तु संत दूसरों का दुःख देख कर ही पिघल जाते हैं । श्रुति / वेद में अहिंसा को परम धर्म कहा है और पर पीड़ा को नीचता ; परनिंदा को पाप कहा है ।
मन की मलीनता से शरीर में रोग होते हैं - विषयों की इक्षा से पीड़ा , ममता से चर्म रोग , इर्ष्या से खुजली , हर्ष -विषद से गले के रोग , दूसरे के सुख को देख कर जो जलन है , वह क्षय रोग है , मन की दुष्टता और कुटिलता से कुष्ट रोग होता है , अहंकार से गांठ का रोग , दंभ , कपट , मद ,मान से नसों के रोग , लालच से उदरब्रिद्धि और मोह से तो नाना प्रकार के रोग पैदा होते हैं । अविवेक और मत्सर से ज्वर ; काम से बात ; क्रोध से पित्त जनित रोग ; लोभ से कफ और इन तीनों के मिलाने से सन्निपात होता है । एक रोग मरने को बहुत है परन्तु लोग तो अनेकानेक रोगों से ग्रस्त हैं । नियम ,धर्म , आचार, तप , यज्ञ , जप , ज्ञान , दान और औषधियों से ऐ रोग नही जा सकते । यह जान लेने से कि किस मानसिक अवस्था से क्या रोग बनते हैं , उसी तरह से आचरण कर इन्हे कम किया जा सकता है । प्रभु प्रार्थना और ईश- कृपा से सभी रोग नष्ट हो जाते हैं क्योंकि राम भक्ति से मन निर्मल हो जाता है । ( पातंजल योग -सूत्र भी यही कहता है , जैसे '' हिंसा तन्निरोधे वैर त्यागः '' अर्थात अपने मन में किसी के प्रति हिंसा का भाव न रखने से दूसरे लोग आपसे वैर नही करेंगे .
राम चरित मानस उत्तर कांड - १२० से १२२ दोहों के मध्य ।
कृपया राम चरित मानस पढ़ें .

राम कृपा

इस संसार में कौन ऐसा ज्ञानी , तपस्वी ,वीर , कवि ,विद्वान और गुणी है जिसके मन में लोभ ने बिडम्बना न पैदा की हो ?मोह ने किसे अँधा नही किया ; काम के वश होकर कौन नही नाचता रहा ; तृष्णा ने किसे पागल नही किया ; धन/ संपत्ति ने किसे टेढा नही बनाया ; प्रभुता / अधिकार ने किसे बहरा नही बनाया ; कौन ऐसा है जिसे मृग-नयनी के नयन -सर नही लगे ; सत,रज और तम इन तीन गुणों ने किसे प्रभावित नही किया ; कौन मान और मद से अछूता रहा ; यौवन -ज्वर की सीमा में कौन रह सका ; ममता के अपयश ने किसे नही नष्ट किया ; मत्सर / इर्ष्या ने किसे कलंकित नही किया ; शोक की बयार ने किसे बिना हिलाए छोड़ दिया ; चिंता रूपी सांपिन ने किसे नही डसा ; इस जगत में माया से कौन बचा ; शरीर रूपी किस मनुष्य के बृक्ष को मनोरथ /इक्षा रूपी कीड़े ने नही खाया और पुत्र , धन-संपत्ति और लोकप्रतिष्ठा की लालच ने किसे मलिन नही किया ?
केवल जिसपर प्रभु राम / हरि की कृपा रही हो ।
- ------राम चरित मानस , उत्तर कांड , दोहा ७० के पहले और बाद ।
कृपया राम चरित मानस पढ़ें ।

Thursday, July 30, 2009

LEARNING TO GROW

Try to be stable in your mind in good and bad that counters you and face this situation /work / person with calm and peace of mind but with all your might and resources available there then . do not search , doubt and debate ; do not ride and lose hope or confidence . /1 /
Divide your self in between two , no -1 and no - 2 . let the no 1 see /watch / be witness what the no - 2 does . no - 1 is moral mind and no -2 is acting mind . if moral mind is always aware what acting mind is doing or going to do you can not go wrong . example - no - 2 is breathing / talking / walking /eating / cheating /receiving / deceiving etc. etc. and no- 1 is watching it all , is aware of no - 2 's actions. by little practice it goes to your Nature and you find that you have grown extremely strong in your Will- Power . based on theory of continuous Awareness of Lord Krishna in GEETA . continuous Awareness is the best way to save from wrong and leading to right . /2/
Open yourself to achieve any thing in life . do not wait for any help from any one . if it comes , let it come . when you open yourself to action you open to World and God . the Moment you have is the Best ; the life you have is the Best. the ability and resources you have is the Best and the Work you have is the BEST and only of and for you to be completed . / 3 /
HUMILITY is the beginning of all goodness and greatness .do not leave it , never . /4 /
Any thing you heard , learned , taught , told , advised , suggested and asked to do , please apply your own REASON and only do it when your reason agrees to it . be scientific as well as moral in your approach . learn to say ' NO ' if reason says 'no' . /5 /
There is nothing beyond and out-side you . all that is out is in you and you are in all . you are the part of Whole and again whole exists in you . if you do not the whole does not . do not run , do not search , do not be fooled by those who say that they will reach you God and moreover do not be fool about yourself by wasting your life and time . THIS WHOLE CREATION and YOU and YOURSELF/YOUR LIFE , THIS ALL IN ONE , is GOD . /6 /
PRAYER has true love , peace , progress , brotherhood , good will and GOD. /7 /

Tuesday, July 28, 2009

धन्य तुलसीदास

वही सर्व ज्ञानी और ज्ञाता , पंडित , गुणी और दाता है , धर्म परायण है , कुलभूषण है , जो राम भक्त है । वही नीति -निपुण , परम सयाना , श्रुति सिद्धांत अच्छी तरह से जानने वाला है , वही कवि और बुद्धिमान है , वही बहादुर है जो राम -भक्त है । वह देश धन्यजहाँ गंगा हैं , वह स्त्री धन्य जो पतिव्रता है , धन्य राज नेता जो नैतिक है , धन्य वह जो अपना धर्म नही छोड़ता । वह धन , धन्य जो दान में खर्च हो , धन्य वह बुद्धि जो परहित और पुण्य में लगी हो ; धन्य वह समय जब संतों का साथ और सत्संग हो । शिव शिवा से कहते हैं , '' वह कुल धन्य जिसमें राम भक्त पैदा हो '' ।
धन्य वह देश भारत, जहाँ तुलसी दास ऐसा महान कवि हुआ और जिसने राम चरित मानस ऐसा अनुपम महाकाब्य लिखा । '' संभु प्रसाद सुमति हिय हुलसी । राम चरित मानस कवि तुलसी ॥ '' और धन्य हैं तुलसी के ' राम '

तुलसी के राम , एक रूप

तुलसी के राम सर्व कालिक , सर्व देशीय और सर्व स्यूत हैं । '' हरि अनंत हरि कथा अनन्ता ''। राम ब्रह्म हैं , राम मनुष्य हैं , राम आदर्श हैं , राम के अनन्त रूप , कार्य और ब्यवहार हैं , राम पुरुषोत्तम हैं , अनादि , अज और अब्यक्त हैं । उनके विविध रूप और विविध कार्य -ब्यवहार हैं । यह सब राम चरित मानस को पूरा और बार बार पढ़ने ,समझने और चिंतन मनन करने से ही ज्ञात हो सकेगा । सभी संदेह , शंका समाधान राम -कथा में ही मिल जायेगी । '' राम कथा सुंदर करतारी । संसय बिहग उडावनहारी ॥ '' यहाँ हम एक रूप की चर्चा करते हैं । --
'' राम सौ करोड़ कामदेवों से सुंदर हैं और अनंत दुर्गाओं से अधिक शत्रु नाशक हैं । सत कोटि पवन से अधिक बल वाले है । उनका प्रकाश सौ करोड़ सूर्यों से अधिक है तथा वे सत -कोटि चन्द्रमा से शीतल तथा सुखदायी है । सत कोटि ( सौ करोड़ ) यम् /काल से दुस्तर , दुर्गम और दुरंत हैं । सत कोटि धूमकेतु से प्रबल और सत कोटि पाताल से गहरे /अगाध हैं । अमित कोटि ( अनंत करोड़ ) तीर्थों से पवित्र उनका नाम है । कोटि हिमालय से अधिक स्थिर और सत कोटि समुद्रों से अधिक गंभीर हैं । सभी की कामनाओं को पूरा करने में सत कोटि कामधेनु के सामान हैं । अमित कोटि सरस्वती / ज्ञान की देवी से अधिक बुद्धिमान , चतुर और रचना करने में सत कोटि ब्रह्माओं से निपुण हैं । सौ करोड़ विष्णु से अधिक पालन कर्ता और सौ करोड़ शिव से अधिक संहारक हैं । सौ करोड़ धनवान भी उनकी बरबरी में नही है और सौ करोड़ मायाओं से अधिक मायावी हैं । भार उठाने में सौ करोड़ शेष नाग से बली हैं । श्री राम सीमा रहित और उपमा रहित हैं । यह तो मात्र एक कथन है जो अभिब्यख्ति की परम -चरम सीमा हो सकती है । राम तो निरुपम /उपमा रहित हैं , किसकी कैसे उपमा दें , राम के सामान तो बस राम ही हैं । आप ही सोचिये ? क्या यह कहा जा सकता है कि सौ करोड़ खद्योतों / जुगुनुओं से सूर्य अधिक प्रकाशवान है ? ऐसा कहना तो सूर्य का मजाक उड़ाना हुआ परन्तु किया भी क्या जाए , अपनी मति / बौद्धिक क्षमता के अनुसार ही तो कहा जा सकता है सो संत और मुनि निज निज मति अनुसार ऐसा ही कहते हैं ।
श्री राम अपार गुणों के समुद्र हैं ,क्या उनकी कोई थाह पा सकता है , संतों से मैंने (तुलसी दास ) जैसा कुछ सुना था , वही आपको सुनाया ।
--राम चरित मानस ; उत्तर कांड - ९० से ९२ दोहों के मध्य ।
कृपया

Monday, July 27, 2009

राम चरित मानस में चिंतनीय /सोचनीय /शोक करने योग्य लोग

राम चरित मानस में उन लोगों का विवरण है जो चिंतनीय / सोचनीय / शोक करने योग्य हैं । कृपया देखें ----
शिक्षक जो ज्ञान से हीन/ रहित हो । जो अपना धर्म /कर्तब्य छोड़कर अन्यथा अतिअधिक विषयों में लीन हो । राजा / शासक /राज - नेता जो नीति न जनता हो और जिसे प्रजा / जनता प्राणों के सामान प्रिय न हो । जो धनवान होकर भी कंजूस हो और अतिथि तथा गरीबों की मदद न करता हो । जो मुर्ख , वाचाल , अहंकारी , स्व- मानप्रिय और ज्ञान -गुमानी हो । पत्नी जो पति- वंचक , कुटिल , कलह- प्रिय और असंयमित हो । पुरूष जो पर धन और पर पत्नी में कुदृष्टि रखता हो . क्षात्र जो पढ़ाई नही करता और गुरु का आदर भी नही करता । वह गृहस्थ जो मोह वश अपने गृहस्थी के कार्य नही करता । सन्यासी जो विवेक और वैराग्य से विमुख /विरत होकर प्रपंच -रत है । वैरागी जो तप छोड़कर भोग में लगा हो । जो निंदा करने वाला , अकारण क्रोध करने वाला , माता -पिता , गुरु और बंधु / बांधवों का विरोध करने वाला है । जो दूसरों का बुरा / अपकार करने वाला , अपने ही शरीर का पोषण करने वाला और भारी निर्दयी है । जो प्रभु की प्रार्थना नही करता ।
उपरोक्त सभी चिंता करने / सोच करने और शोक करने योग्य हैं ।