Monday, February 25, 2013

कर्म का सिद्धांत ...

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एक बहुत भ्रमात्मक समझ है  , कर्म के सिद्धांत  [थियरी ओव एक्शन ] के विषय में ....लोग सामान्यतया समझते हैं कि मनुष्य जो कर्म करता है उसी के आधार पर उसे फल मिलता है , ऐसा बिलकुल भी नहीं है ....इसे ज़रा ठीक से समझ लें .....सारी श्रृष्टि . अस्तित्व  सदैव , प्रतिक्षण कर्म रत है (गीता में कृष्ण ).....देखें , * सोलर सिस्टम के सभी ग्रह  अपनी कक्षा  में गतिशील है  , लगभग ३६५  दिनों में फिर पुराने मौसम  , नई दुनिया लेकर आ जाते हैं ...सब कुछ वही पर एकदम नया । * सूरज तपता है ,  सागर वाष्प बनकर बादल बन उठता है , वर्षा होती है , कुछ पर्वतों के शिखरों पर बर्फ बनी ,  शेष नदियों में बहकर रास्ते के नगर-गाँव ,देश, भूमि को सींचता , प्यासे की प्यास बुझाता फिर सागर को लौट आता है , ....* तापक्रम बदलता है ,  पानी जम  गया , धूप  लगी पानी बना , * हवा चली , तूफ़ान आया , साँसें चली , जीव जगत जागता रहा , * मौसं बदला फूल खिले , मधु माखी ने मधु संचित किये , तितली घूमी -पराग सेचन हुआ , बीज बने , बीज गला , जमीन में अंकुरण हुआ ....किं बहुना ??? सारे जड़ -चेतन , फ्लोरा-फैना , प्रकाश , उर्जायें सब काम पर हैं , और सभी , पूरा अस्तित्व हमसे जुड़ा है और सभी के कर्म /एक्शन एक दुसरे को अपने अपने  ढंग और क्षमता के अनुसार एक दूसरे  को प्रभावित कर  रहे हैं .....यह है कर्म का सम्पूर्ण सिद्धांत , और अब क्यों न कहना ??  किसी को नुक्सान पहुँचाओगे तो तुम अपने नुक्सान से बच  नहीं सको गे ....यही हमारा वेदान्त कहता है और यही विज्ञान ....जो अध्यात्म और विज्ञान को दो करके देखते हैं उनकी समझ आधी है , गलत है ....शुद्ध अध्यात्म और सुद्ध विज्ञान एक ही बात कहेंगे  ....यही दोनों के शुद्धता की पहचान है ....'' कर्म प्रधान विश्व करि  राखा '' मानस में तुलसी दास 

Friday, February 8, 2013

VEDANTA

Vedanta  philosophy  has evolved from the teachings of the Vedas, the world's oldest religious writings.
 It propounds - ultimate reality is all-pervading, uncreated, self-luminous eternal spirit, the final cause of the universe, the power behind all tangible forces, the consciousness that animates all conscious beings.
Vedanta is non-dualistic, and from the religious standpoint, monotheistic ; the essential non-duality of God, soul and universe, the apparent distinctions being created by names and forms which, from the standpoint of ultimate reality, do not exist. Vedanta accepts all religions as true and regards the various deities of the different faiths as diverse manifestations of the one God.
Vedanta, religion is experience and not mere acceptance of certain time-honored dogmas or creeds. To know God is to become like God. We may quote scripture, engage in rituals, perform social service, or pray with regularity, but unless we realize the Divine spirit in our hearts, we are still phenomenal beings, victims of the separative existence. One can experience God as tangibly 'as a fruit lying on the palm of one's hand,' which means that in this very life we can suppress our lower nature, manifest our higher nature, and become perfect ; one's doubts disappear and the 'knots of the heart are cut asunder.'
Truth is universal and all humankind and all existence are one. It teaches the unity of Godhead, or ultimate Reality, and accepts every faith as a valid means for its own followers to realize the Truth. The four cardinal principles of Vedanta may be summed up as follows: the non-duality of the Godhead, the divinity of the soul, the unity of existence and the harmony of religions.
: "Each soul is potentially divine, the goal is to manifest this divinity within by controlling nature: external and internal. Do this either by work, or worship, or psychic control, or philosophy -- by one, or more, or all these -- and be free. This is the whole of religion. Doctrines, or dogmas, or rituals, or books, or temples, or forms, are but secondary details

Saturday, February 2, 2013

बिना यात्रा की मंजिल .....

मनुष्य के जीवन का उद्येश्य , जाहिरा , आनंद की   खोज और उसे हासिल करना है .जीवन के हर क्षेत्र  से  , यहाँ तक कि दुखद परस्थितियों में भी आदमी ख़ुशी की तलाश करता है , अपनी नैसर्गिक क्षमताओं को   , बढ़ा कर और विकसित कर  , वह ऐसा कर सकता है ,  बशर्ते  वह  जीवन  के प्रति दृष्टिकोण को सकारात्मकता के शीर्ष तक बदलने की कोशिश करे ।
कहावत है  - '' परमात्मा ने मनुष्य बनाया और मनुष्य ने शहर बनाये ''. वैसे अबतक हमे पक्का मालूम नहीं  -किस शक्ति  ने हमे बनाया और किसलिए  ? फिर भी यह निश्चित मत है कि उसने हमे सृष्टि की सर्वोत्तम कृति के रूप में बनाया और शायद अपने  ही उस रूप में ,  जो सिमित रूप में स्वतंत्र  , पर उस जैसा ही है जो अपनी क्षमता और बुद्धि से खोज कर सके , अपने खुद में सुधार कर सके , रचना और पुनर्रचना कर  सके , सुधारे चीजों को , बदले , अच्छा करे , उन्नत करे अपनी आस पास की चीजों को जो उसकी जिन्दगी को बेहतर करने में उपयोगी हों ....लगता है सारी  पृथ्वी पर जड़  चेतन उसकी जिन्दगी के बेहतरी के लिए , सहयोग के लिए हैं , वह इनका उचित उपयोग कर आनंद भोगे .....
 और भी , मनुष्य , इसके साथ साथ खतरों के खिलाड़ी के रूप में भी समर्थ है , शरारती है , मौके बे-मौके  शांति और सुख  की चाह  है  उसे  , वहीँ अक्सर उसने  खतरे के साथ खेलना और चुनौतियों से आनंद लेना सीख लिया है , खास कर जब वह खाली  वक्त या  फुर्सत में हो , उसने मधुर और नमकीन के साथ बड़े होने पर लाल मिर्च , काली मिर्च और तीखी , तीती  बस्तुओं  में भी स्वाद लेना सीख लिया है  (  बच्चे तो मीठा , नमकीन दो ही स्वाद जानते हैं ) देखिये ! मौत तो आदमी की सबसे बड़ी शत्रु है .पर वह मौत से भी दो दो हाथ करने , पहाड़ों की चोटियों पर चढ़ने , समुद्र की गहराई में उतरने और गुब्बारों में उड़ता हुआ , मृत्यु को चुनौती देते आनंद मनाते , खोजता  फिरता है , 
 मैं स्कूल में पढ़ता था , तो मैंने अनगिनत कोशिशें की  , कि स्कूल के पढाई से इतर क्रिया कलापों में भाग लूं पर बेंचों पर ही बैठा रहा  या तो चुना ही नहीं गया ,  मुझे लगता कि मैं रिजेक्टेड , स्टुपिड , अयोग्य  , किसी काम का नहीं , ऐसा ही इस दुनिया में आया था . यही मेरी कम उम्र की नकारात्मक भाव - ग्रन्थि  थी कि मै  किसी काम का नहीं और मेरे पास कुछ नहीं था जिसे दुनिया को दे सकूं , किसी भी सड़क से और शहर से बारह  किलोमीटर दूर , मैंने एक ऐसे स्कूल में पढ़ा जिसकी कक्षाए एक पेड़ की छाया में होती थी , हाय ! मैंने  तो कभी उसी प्राइमरी स्कूल का टीचर होने का सपना भी न देख सका था ....... हममें से बहुत , इसी ढर्रे पर सोचते और जीते रहते हैं  ,कि उनमे कोई टैलेंट नहीं है , कोई गिफ्ट , विशेष योग्यता ,  क्षमता नहीं है ,  ''हे भगवान फिर हम क्या करें '' लेकिन  मैं कहूं   -- हमसे आपसे ज्यादा बौद्धिक  और शारीरिक अपंगता वाले  , बहुत उत्तम ढंग से जिन्दगी से पेश आ रहे है और हमसे ज्यादा खुश हैं , मेरे एक मित्र जो एक बड़े मंदिर के महंथ  हैं , जन्म से अंधे हैं  , मुझे एक बार एक समारोह में मिले ; हमारा एक घंटे की वार्ता / साथ रहा पर जब वे मुझसे 18 साल बाद फिर मिले तो मेरी आवाज़ से पहचान लिया और  मुझे  मेरे पूरे नाम से बुलाया  , मैं  तो स्तब्ध रह गया .....शुरू कीजिये , अपने भीतर खोजिये , क्या है आपके भीतर उसे बढ़ाइए , विकसित ,  डेवलप करिए , देखिये वह , जो आप में है और आश्चर्य ! आपने उसे कभी देखा ही नहीं  , जाना ही नहीं , .....प्रार्थना करिए , भागिए मत , छोडिये मत , कर्म करिए , लगे रहिये , काम, करने से आदमी अनुभव से सीखता और योग्य होता  जाता है , इतना करिये कि आपमें परमात्मा की जो चिंगारी है वो लौ बन जाये और आप में चमक उठे ......
जो चाँदी  के चम्मच के साथ जन्मते हैं , जो पीएम , सी एम पैदा होते हैं  , मैं  नही जानता -  वे क्या पाते हैं , उन्हों ने तो कोई यात्रा ही नही की , उन्हें क्या पता ऐडवेंचर क्या है , चुनौती क्या है , विपातियों में कैसे आनंदित हुआ जाता है , सफरिंग का मजा क्या और कैसा होता है , वे तो मंजिल पर पैदा हुए मंजिल पर मर  गये  ,,,भला सोचिये बिना यात्रा की कैसी मंजिल होगी ?---नीरस और बेस्वाद ....यात्रा ही नहीं की , तो मंजिल कैसी .?....मुफ्त में पाना और कमाना दोनों अलग चीजें है ...


 

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Tuesday, November 6, 2012

हकीकत ..

हकीकत .............................
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चलो ए  फ़र्ज़ करते है ,
कि तुम मशरिक़   ; मैं मगरिब
चलो ए मान लेते हैं ।
बहुत लंबा सफ़र है ए
मगर ए भी हकीकत है
तुम्हारी जात का सूरज ;
मेरी हस्ती में डूबेगा ।
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मशरिक़ ; मगरिब = पूरब ;पश्चिम /उदयाचल ; अस्ताचल // जात ,हस्ती = अस्तित्व /जीवन.....
 REALITY - Suppose , u r east n I am west , agreed ; it's a long long journey no doubt ,  bt it's also a reality that yr Sun(rose in east) sets in my existence (west).

{ quoted by Riya}
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 अगर 'चे   दो  किनारों  का  कहीं  संगम  नहीं  होता ,
मगर  एक  साथ  चलना  भी  तो  कोई  कम  नहीं  होता ,
बदन  से  रूह  जाती  है  तो  बिछती  है  सफ्फ -ए-मातम ,
मगर  किरदार  मर   जाए  तो  क्यूँ  मातम  नहीं  होता ?
हज़ारों  ज़ुल्मतों  में  भी , जवान  रहती  है  , लौ  उसकी ,
चराग़े -इश्क  जलता  है  ,  तो  फिर  मद्धम  नहीं  होता ,
वो  आँखें  एक  लुटा  घर  हैं , जहाँ  आंसू  नहीं  रहते ,
वो  दिल  पत्थर  है , जिस  दिल  में  किसी  का  ग़म  नहीं  होता ...!!
- जावेद अख्तर

Thursday, September 6, 2012

.हम और परमात्मा

ॐ हरी .......
.'' कर्म प्रधान विश्व  करि   राखा / जो जस करै , सो तस फल चखा  [मानस में तुलसी ]
कहा जाता है परमात्मा ने मनुष्य को अपने ही प्रतिरूप में बनाया ,परमात्मा असीमित , परम स्वतंत्र और  त्रुटि रहित चैतन्य शक्ति है जिसके विचार और कार्य एक ही होते है जब कि मनुष्य को विचार को कार्य में बदलना होता है , मनुष्य को  उसके भिन्न भिन्न उत्तेजनाओं और परिस्थितियों में निर्णय लेने में एक स्वतन्त्रता तो होती है पर यह स्वतंत्रता केवल निर्णय लेने तक रहती है , निर्णय लेने के बाद कार्य कर लेने या हो जाने पर उसकी स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है और कृत कार्य के अनुसार फल निश्चित हो जाता है ,.... यही मनुष्य की स्वतंत्रता ही उसके दुःख का कारण भी बन जाती  है , तब ,  जब वह निर्णय लेने में गलती करता है , चाहे  जान बूझ कर या चूक से , तब उसे इस कर्म -फल  को  भोगना  ही पड़ता है जो उसने कर लिया है ....सो मनुष्य की स्वतन्त्रता ही उसके सुख दुःख का कारण भी है , बुद्ध ने भी कुछ ऐसा ही कहा है और हमारे वेदान्त और गीता , मानस भी यही कहते है ....इमैनुअल कैंट तो कर्म और फल को एक ही बताता है  ....अतः कर्म -निर्णय लेने में चूक न होने पाए इस लिए हम ईश्वर से प्रार्थना करते है , क्योंकि हम उसी के अंश हैं और हमारी चेतना से परमात्मा / वैश्विक चेतना से  सदा  ही संपर्क , सम्बन्ध बना रहता है ..कहिये परमात्मा का एक अंश हमारे रोम रोम में ब्याप्त हुआ रहता है 

Wednesday, September 5, 2012

CRITICISM

 राधा कृष्णन जी की याद में .......
दो  सीखें ...... पहली बात , * टच - स्टोन मेथड .....जब मै हाई स्कूल इंटर में पढ़ता था , छोटी छोटी कवितायें लिखता और सोचता बड़ा होकर कवि  बनूंगा . एम् .ए अंग्रेजी में मुझे अर्नोल्ड का एक तरीका  पसंद आ गया कि किसी कविता कि गुणवत्ता जांचनी हो तो तो एक काम करो  - अपनी कविता को किसी बड़े कवि  जैसे कालिदास , ब्यास , वाल्मीकि , तुलसी , कबीर , प्रसाद , के दो एक लाइनों से मिलाओ  ( उसने अंग्रेजी कवियोँ का नाम लिखा है ) अगर तुम्हारी कविता उस जोड़ ,  स्तर की हो तो लिखो और समझो तुम कवि हो . उसी दिन से मेरी कविता लिखने और कवि बनने की बात खतम हो गयी , मैं कविता लिखता , मिलाता और फाड़ कर फेंक देता ...सो कवि बनने का सपना धुल गया (हाँ कुछ इधर उधर की तुकबंदी कर लेता हूँ )
दूसरी बात सीखी राधाकृष्णन जी से ......(आज भी मेरे बहुत मित्र , शुभ चिन्तक कहते हैं - सर ! किताब क्यों नहीं लिखते आप ? )....तो एक बार राधा कृष्णन का इलाहाबाद वि . वि . में आना हुआ , वे भाषण के बाद सवालों का जबाब देते थे ....सो एक छात्र ने सवाल किया , सर ! आप हमेशा , वेद , उपनिषद और महान लेखकों , कवियों के कोट्स /उद्धरण ही देते हैं , कुछ अपनी बात नहीं कहते , तो राधा कृष्णन ने संस्कृत का एक और कोट कहा  जिसका अर्थ है = हमारे ग्रंथों , लेखकों , कवियों और चिंतकों ने जीवन -दर्शन और नैतिक जीवन तथा सत्य/ईश्वर के बारे में इतना उन्नत लिख दिया है कि और कुछ नया लिखने की जरूरत नहीं है,विकल्प /संभावना भी नहीं दिखती  , पर जो लिखा गया है उसे ही समझ लेने और जीवन में जितना हो सके उतारने की जरूरत है .( सो .....मैं , जो लिखा है उसे ही पढने और समझने , लागू करने में लगा हूँ , अब उपनिषदों से अच्छा लिखूं , तो जरूर लिखूं , सो किताब लिखने का कोई इरादा भी नहीं रहा ) {विज्ञानं और लाइफ साइंस के खोजों पर यह कथन लागू नहीं , और मेरा यह क्षेत्र नहीं है , सो इस क्षेत्र में लोग खोजें और जरूर लिखें या फिर साहित्य के क्षेत्र में कोई बड़ी लकीर खींचें }
*Matthew Arnold’s ( अ विक्टोरियन क्रिटिक ) touchstone method is a comparative method of criticism. According to this method, in order to judge a poet's work properly, a critic should compare it to passages taken from works of great masters of poetry, and that these passages should be applied as touchstones to other poetry. Even a single line or selected quotation will serve the purpose. If the other work moves us in the same way as these lines and expressions do, then it is really a great work, otherwise not.....आज कल प्रायः लोग पैसे वाले ,भ्रष्टाचार से धन कमाए हुए , पदों वाले , कि वे बड़े विद्वान् और ऋषि जैसे हैं ,  न कि ऐरू -गेरू , और कुछ कवि ,लेखक ऐसा होने की लालच में कुछ खाद गोबर लिख कर छपवा लेते हैं और सबको बांटते हैं कि देखो मैं लेखक /कवि हूँ , उन्हें कोई पढ़ता नहीं , मेरे पास ऐसी पचासों पुस्तकें पड़ी हैं , जो मेरे बच्चे कभी रद्दी में बेचेंगे , ऐसी कविताएँ और लेख , नावेल , मैं तो रोज  कहता रहूँ , लोग लिख लें , पर क्या फायदा ? अर्नोल्ड और राधा कृष्णन लिखने की अनुमति नहीं देते .....मैं तो पढने में संतुष्ट और आनंदित हूँ .

Thursday, August 23, 2012

AWARENESS OF THE SELF

जब मैं बीएचयू  से बी एड  कर रहा था तो मेरी दोस्ती  बीएचयू के  दो प्राध्यापकों से हुई , जो कैम्पस में निवास न पाने के कारण मेरे साथ अस्थायी रूप से किंग एडवर्ड होस्टल में ही रहते थे , एक गणित के थे और दूसरे अंग्रेजी के , दोनों ही अपने बैच के टापर  थे , तो वे दोनों शाम को थोड़ा पीते थे , एक दिन चर्चा में उन दोनों ने मुझे सलाह  करी कि मुझे भी पीना चाहिए तो मैंने उन्हें उमर  खैयाम की एक *रूबाई सुनाई जिसे मैंने 1964 में पढ़ा और समझा था , उसकी ब्याख्या भी मैंने की और वे दोनों इतने प्रभावित हुए कि दुसरे दिन से पीने को अलविदा कर दिया , मैंने जो कहा था , वह यह था ------- जो नशे में होते हैं वे पीते हैं , क्षमा करिएगा , मैं तो होश में रहता हूँ , बस्तुतः आज के लोग जिसमे आप लोग भी दुर्भाग्य से शामिल है अधिकतर हमेशा नशे में ही रहते हैं यानि कि बेहोश ,लोगों का जीवन इतना जटिल हो गया है कि उन्हें अपने स्व /सेल्फ का ज्ञान  ही नहीं रह गया है , वे भूल गये हैं कि , वे है क्या और कौन ? इसलिए वे कोई न कोई नशा करते हैं और तब उस नशे में उनको होश आता है कि वे कौन हैं .स्व का ज्ञान होता है , इसी लिए , अपराधी या सड़क का मजनू जब पी लेता है तो उसका स्वाभिमान कहता है - कौन पुलिस ? कौन एस पी ? मेरे आगे कोई नहीं , मैं हूँ , मैं ! और इसिलए आज के फददू कवि पीकर कविताएँ लिखते / करते हैं .....असलियत में लोग नशे के लिए नहीं होश के लिए पीते हैं , बेहोश तो वे पहले से हैं ........इसलिए जो होश में हैं वे क्यों पियेंगे , भला ? ''
अब उमर ने जो लिखा उसकी ब्याख्या देखिये ---'' हाँ  ! कल मैंने  न पीने की कसम खाई थी , हाँ खाई तो थी  , न पीने की कसम , परन्तु जब ये कसम खायी थी ,उस समय मैं होश में कहाँ था , होश में तो अब आया हूँ , ( जब पीने के इरादे में हूँ .............सारे ब्यसनी जो किसी न किसी नशे में हैं वे सब बस्तुतः बेहोशी की हालत में हैं , वो चाहे शराब का नशा हो सिगरेट का , सिनेमा का , या धन , काम , मोह-लोभ का , दुश्मनी का, घृणा का , क्रोध का या या लम्पटता का सब नशे में हैं ,बेहोश हैं , किसी को स्व का ज्ञान नहीं , इसीसे इतना दुःख ,असंतोष , भ्रष्टाचार ,हिंसा , धार्मिक ढोंग और चीत्कार ब्याप्त है ....स्व का जिसे ज्ञान है वही इन सब से मुक्त है और आनन्द मैं है .
* Indeed, indeed, Repentance oft before
 I swore but was I sober when I swore?
 And then and then came Spring, and Rose-in-hand
 My thread-bare Penitence apieces tore.
 >>> Rubaiyat of Omar Khayyam by Edward FitzGerald