Wednesday, December 2, 2009

Friday, November 6, 2009

सत्याग्रह

विजेता के हाथ अपनी आत्मा को बेचने से इंकार करने का अर्थ है कि तुम वह काम नहीं करोगे जिसे करने के लिए तुम्हारी अंतश्चेतना तुम्हें रोकती है। सत्याग्रही का 'न' अटल 'न' और उसका 'हां' शाश्वत 'हां' होता है। केवल ऐसे ही व्यक्ति में सत्य और अहिंसा का पुजारी होने की ताकत होती है। लेकिन यह जरूर है कि आदमी को दृढ़ निश्चय और जिद का फर्क समझना चाहिए।
सत्याग्रही भय को सदा के लिए छोड देता है। इसलिए वह विरोधी पर विश्वास करने से कभी डरता नहीं है। विरोधी बीस बार भी उसको धोखा दे जाए, वह इक्कीसवप बार उस पर विश्वास करने के लिए तैयार रहेगा। बात यह है कि मानव प्रकृति में अडिग विश्वास ही सत्याग्रही के धर्म का सार है।चूंकि सत्याग्रह सीधी कार्रवाई का सबसे शक्तिशाली रूप है, इसलिए सत्याग्रही सत्याग्रह शुरू करने से पहले बाकी सब तरीकों पर अमल करके देख लेता है। तदनुसार वह पहले संबंधित प्राधिकारी से संपर्क करेगा और उसे जारी रखेगा, फिर जनमत का ध्यान आकर्षित करेगा, लोगों को संबंधित समस्या से अवगत कराएगा, जो उसकी बात सुनना चाहते हैं उनके समक्ष शांतिपूर्वक अपना पक्ष प्रस्तुत करेगा, और जब सभी उपाय चुक जाएंगे तब सत्याग्रह की शरण लेगा। लेकिन एक बार अंतर्वाणी का आदेश सुन लेने के बाद यदि वह सत्याग्रहश्शुरू कर देता है तो फिर किसी भी हालत में उससे पीछे नहीं हटेगा। सत्याग्रही यद्यपि हर समय संघर्ष के लिए तैयार रहता है, पर उसे शांति के लिए भी उतना ही उत्सुक रहना चाहिए। उसे शांति के किसी भी सम्मानजनक अवसर का स्वागत करना चाहिए।
सत्याग्रही की योग्यताएं मेरा विचार है कि भारत के प्रत्येक सत्याग्रही में... निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिए: (1) उसे ईश्वर में जीती-जागती आस्था होनी चाहिए, क्योंकि वही तो उसका एक मात्र अवलंब है। (2) उसे सत्य और अहिंसा को अपना धर्म मानते हुए उनमें विश्वास रखना चाहिए और इसी कारण, उसे मानव-प्रकृति की अंतर्निहित अच्छाई में भी आस्था होनी चाहिए। उसे आशा रखनी चाहिए कि वह इसी अच्छाई को अपने पीड़ा-भोग के जरिए सत्य तथा प्रेम की अभिव्यक्ति करके जगाने में कामयाब होगा। (3) उसे पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए और अपने ध्येय की पूर्ति के लिए अपने जीवन और अपनी संपत्ति को न्यौछावर करने के लिए तैयार तथा इच्छुक रहना चाहिए। (4) वह आदतन खादी धारण करने वाला तथा चरखा कातने वाला होना चाहिए। भारत के संदर्भ में यह आवश्यक है। (5) वह मद्यत्यागी और अन्य नशीले पदार्थ़ों के सेवन से मुक्त होना चाहिए ताकि उसका विवेक सदा जागृत रहे और चित्त स्थिर रहे। (6) वह समयगसमय पर निर्धारित अनुशासन के नियमों का स्वेच्छा से पालन करे। (7) उसे जेल के नियमों का पालन करना चाहिए, सिवा उन नियमों के जो उसके आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने के लिए विशेष रूप से बनाए गए हों। सत्याग्रही सम्मानजनक शर्त़ों पर समझौता करने का कोई अवसर नहीं खोता, नहीं खो सकता, लेकिन समझौता-वार्ता असफल हो जाने पर उसे संघर्ष के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए। उसे पहले से कोई तैयारी करने की जरूरत नहीं है, उसकी कार्रवाई में किसी तरह की गोपनीयता नहीं होनी चाहिए।
सत्याग्रही का उद्देश्य अन्यायी पर जोर-जबर्दस्ती करना नहीं, बल्कि उसका हृदय-परिवर्तन करना है। उसे अपने समस्त व्यवहार में बनावटीपन से बचना चाहिए। वह सहज रूप से तथा अपने आंतरिक दृढ़ विश्वास के बल पर काम करता है।सत्याग्रह मूलतः सत्यनिष्ठ व्यक्ति का हथियार है। सत्याग्रही अहिंसा से प्रतिबद्ध होता है और जब तक लोग मनसा, वाचा, कर्मणा इसका पालन न करें, मैं सत्याग्रह नहीं कर सकता। सत्याग्रही भगवान पर भरोसा रखता हैजिन्हें सत्याग्रह के अतुल बल का थोडा-सा भी ज्ञान है, उन्हें अपने पडोसियों को कमजोरी तथा लाचारी के साथ नहीं बल्कि बहादुरी के साथ और जान-बूझकर दमन को बर्दाश्त करना सिखाना चाहिए... जब तक सत्याग्रह का इच्छुक व्यक्ति प्रशिक्षण के आवश्यक चरणों से नहीं गुजरेगा, जो बडा जानमारू काम है, तब तक वह प्रबल एवं सक्रिय अहिंसा का विकास नहीं कर सकता। जब तक दुर्भाव है तब तक सत्याग्रह की स्पष्ट विजय असंभव है। लेकिन जो अपने को दुर्बल समझते हैं, वे प्रेम करने में असमर्थ होते हैं। इसलिए हमारा पहला काम यह होना चाहिए कि प्रतिदिन प्रातःकाल यह संकल्प करेः 'मैं दुनिया में किसी से नहीं डरूंगा। मैं केवल ईश्वर से डरूंगा; मैं किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखूंगा। मैं किसी का अन्याय सहन नहीं करूंगा। मैं असत्य पर सत्य से विजय प्राप्त करूंगा और असत्य का प्रतिकार करते हुए हर प्रकार की पीडा को भोगने के लिए तैयार रहूंगा।'
मेरी –ष्टि में सत्याग्रह दुनिया के सर्वाधिक सक्रिय बलों में से एक है। यह जीवन और प्रकाश तथा शांति एवं सुख का प्रसार करता है . एक सत्याग्रही भी अंत तक डटा रहे तो विजय निश्चित है।मारते हुए मरने वाले लाखों आदमियों के बलिदान के मुकाबले एक निर्दोष व्यक्ति का आत्मबलिदान लाखों गुना ज्यादा असर पैदा करता है।
मैं जानता हूं कि मैं निपट अकेला होऊं तो भी सत्याग्रह छेडने का मुझमें पर्याप्त सामर्थ्य है। मैंने पहले भी ऐसा किया है।सत्याग्रह ऐसा बल है जिसका प्रयोग व्यक्ति भी कर सकते हैं और समुदाय भी। इसका प्रयोग जितना अच्छी तरह राजनीतिक मामलों में किया जा सकता है, उतनी ही अच्छी तरह घरेलू मामलों में भी किया जा सकता है। इसकी सार्वभौम प्रयोज्यता इसके स्थायित्व और अपराजेयता का प्रमाण है। इसका प्रयोग पुरुष, स्त्राh, बच्चे सभी समान रूप से कर सकते हैं।
सत्याग्रह की सफलता के लिए आवश्यक शर्त़ें हैं : (1) सत्याग्रही के मन में विरोधी के लिए घृणा की भावना नहीं होनी चाहिए; (2) सत्याग्रह का मुद्दा सच्चा और महत्वपूर्ण होना चाहिए; (3) सत्याग्रही को अपने ध्येय की पूर्ति होने तक पीडा भोगने के लिए तैयार रहना चाहिए। सशस्त्र प्रतिरोध की अपेक्षा सत्याग्रह सदैव श्रेष्ठ है। इसे तर्क से नहीं बल्कि प्रदर्शन द्वारा ही ज्यादा अच्छी तरह सिद्ध किया जा सकता है। सत्याग्रह का शस्त्र बलशाली का आभूषण है। यह दुर्बल का आभूषण कभी नहीं हो सकता। दुर्बल से यहां आशय मन और प्राण की दुर्बलता से है, शरीर की दुर्बलता से नहीं ।
असहयोग असहयोग जनसाधारण में अपनी गरिमा और शक्ति की भावना जागृत करने का एक प्रयास है। यह तभी संभव है जब उन्हें यह ज्ञान कराया जाए कि यदि वे अपनी अंतरात्मा को पहचान सकें तो उन्हें पशुबल से डरने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी।
असहयोग बुराई में अनजाने और अनिच्छापूर्वक भागीदारी करने के विरुद्ध किया गया प्रतिवाद है... बुराई के साथ असहयोग करना उसी प्रकार मनुष्य का कर्तव्य है जिस प्रकार अच्छाई के साथ सहयोग करना। असहयोग कोई निक्रिय स्थिति नहीं है, यह अत्यंत सक्रिय स्थिति है । प्रतिरोध या हिंसा से अधिक सक्रिय। निक्रिय प्रतिरोध एक गलत संज्ञा है। असहयोग शब्द का प्रयोग मैंने जिस अर्थ में किया है, उसमें इसका अहिंसक होना आवश्यक है और इसीलिए यह न तो दंडात्मक है और न द्वेष, दुर्भावना अथवा घृणा पर आधारित है।
मैं साहसपूर्वक यह कहना चाहता हूं कि भगवद्गीता अंधकार और प्रकाश की शक्तियों के बीच असहयोग का सिद्धांत है। यदि इसकी शाब्दिक व्याख्या की जाए तो सदुद्देश्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अर्जुन को अन्यायी कौरवों के साथ युद्ध करने के लिए आदेश दिया गया था। तुलसीदास ने संतों को परामर्श दिया है कि वे असंतों की संगति से बचें। अहिंसा का पालन इस बुनियादी सिद्धांत पर टिका है कि जो अपने विषय में सही है, वही समस्त विश्व के विषय में भी सही है। सभी मनुष्य मूलतः एक जैसे हैं। इसलिए जो मैं कर सकता हूं, उसे हर कोई कर सकता है...वस्तुतः अहिंसा की कसौटी ही यह है कि अहिंसक संघर्ष में, उसके उपरांत कोई विद्वेष बाकी न रहे और शत्रु मित्र बन जाएं। दक्षिण अफ्रीका में जनरल स्मट्स के साथ मेरा यही अनुभव रहा। शुरू में, वह मेरे कट्टर विरोधी और आलोचक थे। आज वह मेरे अन्यतम मित्र हैं... असहयोग यद्यपि सत्याग्रह के शस्त्रागार का मुख्य शस्त्र है, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सत्य और न्याय पर –ढ रहते हुए विरोधी का सहयोग प्राप्त करने का एक साधन मात्र है। अहिंसक विधि का सार यह है कि यह विरोध को समाप्त करने का प्रयास करता है, स्वयं विरोधियों को नहीं। अहिंसक संघर्ष में तुम्हें, कुछ हद तक, जिस व्यवस्था का तुम विरोध कर रहे हो, उसकी परंपरा और रूढियों को मानना पडता है। इसलिए विरोधी शक्ति के साथ किसी तरह का संबंध न रखना सत्याग्रही का ध्येय कभी नहीं हो सकता; उसका ध्येय तो उस संबंध का रूपांतरण अथवा शुद्धीकरण है। असहयोग जैसा शुद्ध, हानिरहित और फिर भी, कारगर साधन दूसरा नहीं है। विवेकपूर्वक इस्तेमाल करने पर इसके कोई दुष्परिणाम सामने नहीं आने चाहिए। और इसकी गहनता पूर्णतया लोगों की बलिदान करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
कभी-कभी असहयोग भी उसी प्रकार एक कर्तव्य बन जाता है जिस प्रकार कि सहयोग है। कोई व्यक्ति अपने ही सर्वनाश अथवा दासता में सहयोग देने के लिए बाध्य नहीं है। . मेरी निश्चित धारणा है कि जो बात अहिंसक असहयोग से अनाचारी का अंततः हृदय-परिवर्तन करके हासिल की जा सकती है, वही हिंसा से कभी नहीं की जा सकती। मैंने असहयोग को धार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है, चूंकि मैं राजनीति में उसी सीमा तक प्रविष्ट होता हूं जहां तक वह मेरी धार्मिक शक्ति का विकास करती है।मेरे असहयोग के मूल में घृणा नहीं, प्रेम होता है। मेरा व्यक्तिगत धर्म मुझे किसी से भी घृणा करने की इजाजत नहीं देता। मैंने यह सरल किंतु महान सिद्धांत बारह वर्ष की आयु में स्कूल की एक किताब से सीखा . यह मेरे जीवन का एक तीव्र मनोवेग है। कुछ लोगों ने मुझे अपने समय का सबसे बडा क्रांतिकारी बताया है। यह चाहे गलत हो, पर मैं स्वयं को एक क्रांतिकारी, एक अहिंसक क्रांतिकारी अवश्य मानता हूं।
सत्याग्रह के शस्त्रागार में उपवास एक बडा शक्तिशाली शस्त्र है। इसका प्रयोग हर कोई नहीं कर सकता।उपवास करने की शारीरिक क्षमता से ही उसकी पात्रता निर्धारित नहीं की जा सकती। ईश्वर में जागृत आस्था के बिना इसका कोई उपयोग नहीं है। यह एक यांत्रिक प्रयास अथवा मात्र अनुकरण के रूप में कभी नहीं किया जाना चाहिए। उपवास की प्रेरणा व्यक्ति की आत्मा की गहराई से आनी चाहिए। इसलिए उपवास सदा एक विरल घटना होती है।आमरण उपवास सत्याग्रह के शस्त्रागार का अंतिम एवं सबसे शक्तिशाली शस्त्र है। यह एक पवित्र शस्त्र है। इसे इसके संपूर्ण निहितार्थ के साथ स्वीकार करना चाहिए। महत्वपूर्ण स्वयं उपवास नहीं है, बल्कि उसका निहितार्थ है। यह एक शक्तिशाली चीज है, पर अनाडीपन के साथ करने पर यह खतरनाक साबित हो सकता है। इसके लिए पूर्ण आत्म-शुद्धीकरण की आवश्यकता होती है, उससे भी कहीं ज्यादा आत्मशुद्धीकरण की जो केवल मन में ही प्रतिकार की भावना लेकर मौत का सामना करने के लिए चाहिए। पूर्ण बलिदान का एक ही ऐसा कृत्य समूची दुनिया के लिए काफी होगा। ईसा का उदाहरण इसी कोटि में आता है।यदि कोई व्यक्ति, चाहे वह कितना ही जनप्रिय तथा महान हो, किसी अनुचित मुद्दे को उठाता है और उस अनौचित्य की रक्षा के लिए उपवास करता है तो यह उसके मित्रों, सहयोगियों और संबंधियों (जिनमें मैं अपनी गिनती भी करता हूं) का कर्तव्य है कि उसकी प्राणरक्षा के लिए अनुचित मुद्दे को मनवाने की अपेक्षा उसे मर जाने दें। उद्देश्य अनुचित हो तो शुद्ध-से-शुद्ध साधन भी अशुद्ध बन जाते हैं।
--( स्रोत ; हरिजन और यंग इंडिया पत्रिकाओं में गाँधी जी द्वारा लिखे लेखों से तद्वत उद्धरित .)


Friday, October 30, 2009

११ - स्पर्श - भावना

Untouchability means pollution by the touch of certain persons in reason of their birth in a particular sfamily। It is an ugly excrescence in INDIAN society and culture . In the guise of religion, it is always in the way, and erupts religion. Removal of untouchability means love for, and service of, the whole world and humanity at large ,thus merges into Ahimsa। Removal of untouchability spells the breaking down of barriers between man and man and between the various orders of Being. '' consider untouchability to be a heinous crime against humanity। It is not a sign of self-restraint, but an arrogant assumption of superiority. '' - Young India, Dec. 8, १९२०
भारतीय वर्ण ब्यवस्था जो की पहले कर्मणा थी , कालांतर में जन्मना हो चली और उसमे छुआछूत का एक भयंकर दोष आ गया । वर्ण तो सदा सर्वदा रहेंगे परन्तु छुआछूत का रोग मूर्खतापूर्ण और विवेकहीनता का परिचायक था । इसे समूल नष्ट करना अति आवश्यक था , अतः गाँधी जी ने इस भावना को नष्ट करने हेतु इसे अपने एकादश व्रतों में रख कर इस कार्य में मत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
किसी परिवार , धर्म , समूह अथवा राज्य देश या कुल में पैदा होने से मनुष्य / ब्यक्ति बड़ा छोटा , छूत अछूत नही हो सकता । गाँधी जी ने ऐसे लोगों को हरिजन / ईश्वर भक्त और हमारी सेवा का सर्वोत्तम केन्द्र बताया । इनकी सेवा , शिक्षा , उन्नति और सम्मान के अवसरों की समानता के लिए गाँधी जी ने जीवन भर संघर्ष किया और सफलता भी पाई । इसके लिए जहाँ एक तरफ़ हरिजनों में चेतना पैदा की वहीँ अन्य वर्णों ने खुलकर इस कार्य में सहयोग और भागीदारी की । भारत में छुआछूत करीब समाप्त प्रायः हो चला है और इस प्रकार की संकीर्ण भावना का लगभग अंत हो चला है । ज्यों ज्यों शिक्षा बढ़ रही है लोग इसे नकारने की स्थिति में आ गए हैं । गाँधी जी द्वारा समाज में की गई यह एक महान और सफल क्रांति थी जो स्वर्णाक्षरों में लिखी रहेगी ।
गाँधी जी ने इन सभी एकादश व्रतों का पालन - विनम्र व्रत निष्ठां से करने का नियम आश्रम वालों के लिए बनाया था और प्रति दिन सायंकालीन प्रार्थना के अंत में इस प्रकार दुहराया जाता था । -
'' अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य , असंग्रह , शरीरश्रम , अस्वाद , सर्वत्र भय - वर्जन , सर्व -धर्म - समानत्व , स्वदेशी , स्पर्श -भावना ; विनम्र व्रत निष्ठां से ऐ एकादश सेव्य हैं ''


Thursday, October 29, 2009

१० - स्वदेशी

स्वदेशी का अर्थ अधिक से अधिक स्वावलंबी बनना है । जैसे हमको अधिक से अधिक अपने ब्य्कतिगत मामलों में अपने ऊपर ही निर्भर होना है ऐसे ही ब्यक्ति से ऊपर उठने पर परिवार को भी आत्मनिर्भर बनाना चाहिए । परिवार के ऊपर फ़िर हमें अपने ग्राम को भी आत्मनिर्भर बनाना है । जो ख़ुद से हो दूसरे से मदद नही लेना ; जो परिवार से काम चल जाय उसके लिए ग्राम से मदद नही लेना ; जो पड़ोस में मिले उसे दूर देश से नही लेना और यही भाव स्वदेशी का भी है अर्थात अपने देश को अधिक से अधिक आत्मनिर्भर बनाना । देश सामजिक , आर्थिक , शैक्षिक , राजनैतिक और सुरक्षा के मामलों में आत्म निर्भर हो यही स्वदेशी का तात्पर्य है ।
स्वदेशी का विचार किसी भी प्रकार से दुनिया से नाता नही तोड़ना है । अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध बने रहने चाहिए और संपन्न राष्ट्रों को गरीब और पिछड़े राष्ट्रों की मदद करनी चाहिए तथा सम्पूर्ण विश्व में शान्ति , सद्भाव , मित्रता , वैज्ञानिक शोधों और विकास कार्यों में सभी राष्ट्रों की सहभागिता और सहयोग होना आवश्यक है । सभी राष्ट्रों में बिना किसी रंग भेद ; गरीब -अमीर ; अगडे -पिछडे का विचार किए बिना समानता के आधार पर मित्रता और शान्ति -सहयोग स्थापित होना चाहिए । इनसब कामों के लिए एक शक्तिशाली अंतर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना होनी चाहिए ।
सारे विकास और उन्नति का केन्द्र यद्यपि ब्यक्ति ही है परन्तु ब्यक्ति को परिवार के लिए , परिवार को ग्राम के लिए , ग्राम को जनपद के लिए , जनपद को राज्य के लिए , राज्य को देश के लिए और देश को दुनिया /विश्व मानव जाति के लिए अपने अपने हितों का त्याग करने को तैयार रहना चाहिए । परन्तु यह बात ध्यान में हमेशा होनी चाहिए कि यह सब कुछ साधन ही है , साध्य तो मनुष्य / ब्यक्ति का विकास और उसकी चरम उन्नति ही है । यही स्वदेशी का मूल मन्त्र है ।

Wednesday, October 28, 2009

९ - सर्व धर्म समभाव

''# I believe that there is no such thing as conversion from one faith to another in the accepted sense of the word। It is a highly personal matter for the individual and his God. I may not have any design upon my neighbour as to his faith, which I must honour even as I honour my own. Having reverently studied the scriptures of the world I could no more think of asking a Christian or a Musalman, or a Parsi or a Jew to change his faith than I would think of changing my own." (Harijan: September 9, 1935) "I came to the conclusion long ago … that all religions were true and also that all had some error in them, and whilst I hold by my own, I should hold others as dear as Hinduism। So we can only pray, if we are Hindus, not that a Christian should become a Hindu … But our innermost prayer should be a Hindu should be a better Hindu, a Muslim a better Muslim, a Christian a better Christian।" (Young India: January 19, 1928)
ऊपर का उद्धरण इस प्रकार है - धर्म परिवर्तन उचित नही है । यह ब्य्कतिगत मामला है आदमी और इश्वर के सम्बन्ध का । हमें अपने पडोसी के धर्म का उसी प्रकार आदर करना चाहिए जैसे हम अपने धर्म / विश्वास का आदर करते हैं । आदर के साथ दुनिया के सभी धर्मों का अध्ययन करने के बाद मै इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि जैसे मै अपने धर्म में परिवर्तन नही चाहता उसी तरह किसी ईसाई , पारसी , यहूदी और मुसलमान को उसका धर्म बदलने को न कहूँ , न राय दूँ अथवा न चाहूं । सभी धर्मों में कुछ कमी हो सकती है या है ; परन्तु जैसे मै अपने धर्म में पक्का हूँ वैसे ही सभी धर्म के लोग अपने में पक्के बने रहें । यही मेरे अनुसार धर्म के समझ का सार है ।
मै चाहता हूँ कि सभी धर्म के लोग यही प्रार्थना करें कि यदि वे हिंदू हैं तो और अच्छे हिंदू बन सकें ; अगर मुस्लमान हैं तो और बेहतर / अच्छे मुस्लमान बनें और इसी तरह और बेहतर / अच्छे ईसाई , पारसी आदि आदि बनें ।
सभी धर्मों में वही कहा गया है जो मनुष्य के हित में हो और जिससे हम प्रेम , करुणा , अहिंसा , भाईचारा , एकता विश्वबंधुत्व और विश्व शान्ति की स्थापना कर सकें । जो अपने धर्म को ठीक से समझ लेता है वह निश्चित ही दूसरे धर्मों का आदर करेगा । '' जब हम अच्छा करते हैं तो हमें अच्छा अनुभव होता है और जब हम कुछ बुरा करते हैं तो हमें बुरा अनुभव होता है ; यही मेरा धर्म है '' - अब्राहम लिंकन । और - '' जब हम अच्छाई और सच्चाई के साथ अपनी आत्मा के साथ जीवन बिताते होते हैं तो वही हमारा धर्म होता है '' - एलबर्ट आइन्स्टीन ।

Tuesday, October 27, 2009

८ - अभय

अभय से तात्पर्य है सभी प्रकार के भय से मुक्ति , मृत्यु से , शारीरिक रोग ,चोट से , भूख से ,अपमान से , लोकनिंदा और अपयश से , बुरी आत्माओं और भूत से और किसी भी के क्रोध और धमकी से तथा किसी प्रकार के अन्याय के प्रतिकार और विरोध करने से । अभय , अज्ञानता औरआक्रामकता में भी नही है ; यह तो भय का प्रदर्शन ही है । अभय मानसिक शान्ति और संतुष्ट मन -विचार की सम्यक अवस्था है .
इस प्रकार की अभय अवस्था उसे ही प्राप्त हो सकती है जिसको परमेश्वर की गहन अनुभूति और उसमे अविचल श्रद्घा हो । उपनिषदों में वर्णित अभय परम कर्ता की अपने में सहज अनुभूति और सत्य की समर्थता में अटल विश्वास है जो कभी डिगता नही । केवल ईश्वर को ही डरने की आवश्यकता है और जो ईश्वर को डरता है उसे और किसी को भी डरने या डराने की जरूरत नही होती । जो ईश्वर के साक्षित्व में अपना जीवन ब्यातीत करता है उसे डरने का कोई अवसर ही नही आता । हर समय जो ईश्वर को साथ लिए रहता है , जो की सत्य ही है कि वह हमारे भीतर ही मौजूद है, तो उसे डरने कि जरूरत नही होती ।
वस्तुतः किसी भी प्रकार की हिंसा अथवा हिंसा की विचारधारा के मूल में भय ही होता है और यह भय कायरता का रूप धारण कर लेता है । हिंसा , हिंसा का विचार और सुरक्षा का भय ऐ सभी तत्व मनुष्य को अस्त्र- शास्त्र रखने और उसका प्रयोग करने को उत्प्रेरित करते हैं । एक देश को दूसरे देश का भय ; एक समूह को दूसरे समूह का भय और एक ब्यक्ति को दूसरे ब्यक्ति का भय , उनमे असुरक्षा का भाव पैदा करता है . हिंसा की जड़ में भय , कायरता और कमजोरी ही है जो असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होकर हिंसा पर उतारू हो जाती है , गाँधी जी कहते हैं जो अस्त्र -शस्त्र लेकर सुरक्षा घेरे में चलते हैं या हिंसा करते और उसके विषय में सोचते हैं वे सभी कायर और बुजदिल लोग ही हैं । हमारे उपनिषद और आधुनिक मनोविज्ञान इसकी पुष्टि करते हैं । हिंसा और हिंसा करने वाले कायरों की कभी जीत नही होती । इतिहास इस बात का गवाह है । क्रूरतम हिंसक अंगुलीमाल महान अहिंसक तथागत बुद्ध से पराजित हो गया था और उनका शिष्य भी बन गया । स्वयं सभी बड़े बड़े तथाकथित योद्धा और हिंसा करने वालों ने अंत में प्रेम और करुणा को चरम ताकत बताया है । योगी पतंजलि ने भी अहिंसा को ही विजय का परम साधन कहा है - '' हिंसा तन्निरोधे वैर त्यागः '' (योग-सूत्र )
सत्य, अहिंसा आदि व्रतों का पालन निर्भयता के बिना असंभव है। और हाल में जहाँ सर्वत्र भय व्याप रहा है, वहाँ निर्भयता का चिन्तन और उसकी शिक्षा अत्यन्त आवश्यक होने से, उसे व्रतों में स्थान दिया गया है। जो सत्यपरायण रहना चाहता है, वह न जाति से, बिरादरी से, न सरकार से, न चोर से, न गरीबी से और न मौतसे डरता है।

Monday, October 26, 2009

७ - अस्वाद

मनुष्य को स्वास्थ्य को ध्यान में रख कर ही भोजन करना चाहिए न कि स्वाद अथवा मन के सुख के लिए । गाँधी जी एक लोकप्रिय कहावत का उदहारण देते हुए गाँधी जी कहते है कि भोजन जीने के लिए करना चाहिए न कि भोजन के लिए जीना चाहिए । अस्वाद दूसरी और ब्रह्मचर्य और सयंमित जीवन बिताने में भी उपयोगी होगा । भोजन सादा और सुपाच्य तथा स्वास्थ्य वर्धक हो । भोजन के बीच बीच में उपवास - व्रत भी करना चाहिए जिससे रोगों से बचा जा सके । शरीर धर्म की साधना और अपना कर्तब्य करने के लिए आवश्यक है अतः उसकी रक्षा अच्छे सुपाच्य भोजन और नियमित जीवन से ही की जा सकती है । उपवास और व्रत से मन और शरीर दोनों शुद्ध होते हैं ।
अस्वाद को ब्यापक रूप में लेते हुए गाँधी जी सभी इन्द्रियों पर संयम रखने की सलाह देते हैं जिसके अर्न्तगत बुरी बातों को न सुनना , न बोलना , न छूना , न देखना और न सोचना तथा न करना शामिल है । मन से लालच का त्याग कराने से ही भौतिक शारीरिक अंगो से भी उनका त्याग किया जाना संभव हो सकेगा । '' भोग तो छूट जाते हैं निराहारी मनुष्य के ; रस किंतु नही जाता , जाता है , आत्म लाभ से '' गीता में श्री कृष्ण । (श्लोक का हिन्दी अनुवाद ) इन्द्रियों को विषयों से हटने के लिए या हटाने के लिए हमें अपने मन पर संयम करना होगा क्योंकि जब तक किसी विचार ,विषय या ब्यक्ति के प्रति मन का लगाव रहेगा तबतक अस्वाद की प्राप्ति असंभव है । इसके लिए योग सूत्र में महर्षि पतंजलि ने अनवरत अनचाहे से वैराग्य और चाहे का अभ्यास करने की बात कही है । '' करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान । ''
अस्वाद ब्यक्ति के आत्मनियंत्रण को बढाकर उसे उन्नत करता है जिससे वह अपने उत्तरदाइत्यों का सम्यक निर्वाह कर सके । उन्नत ब्यक्ति ही उन्नत समाज का निर्माता होसकता है ।
स्वाद वस्तुतः लालच का पर्याय है , अतः स्वाद के नियंत्रण से ही लालच को नियंत्रित किया जा सकता है । लालच सभी प्रकार की बुराइयों ओर पाप - कर्मों की जड़ है ।

६ - शरीर श्रम

शरीर श्रम सामाजिक ब्यवस्था में समायोजन और समन्वय लाने के लिए प्रत्येक ब्यक्ति के लिए अनिवार्य होना चाहिए । श्रम करने सम्बन्धी विचार गाँधी को रस्किन और टालसटाय के विचारों से अनुभव में आया । बौद्धिक श्रम के साथ साथ आदमी को शारीरिक श्रम करना चाहिए और कम से कम इतना कि वह अपना पेट भरने की ब्यवस्था कर सके । बौद्धिक श्रम का मूल्य शारीरिक श्रम से अधिक नही होना चाहिए और गाँधी जी तो यहाँ तक कहते हैं कि बौद्धिक सम्पदा को दूसरों के लिए मुफ्त में दान स्वरूप देनी चाहिए । जो बिना शारीरिक श्रम किए खाता है वह चोरी का अन्न खाता है और दूसरे का शोषण करता है । यदि सभी लोग शारीरिक श्रम करे तो किसी को खाने कि कमी नही होगी और न तो किसी का शोषण ही होगा ।
सभी कार्य चाहे वे छोटे हों अथवा बड़े , सभी बराबर महत्व के और सम्मानित कार्य हैं । नाई का काम और इंजिनिअर या डाक्टर का काम एक समान हैं और किसी को कोई भी काम करने के लिए तैयार होना चाहिए । शारीरिक श्रम हमें काफी-कुछ स्वावलंबी बनाता है ।
हर ब्यक्ति को कोई न कोई ऐसा काम करना चाहिए जो उत्पादक हो । यदि कोई किसी प्रकार का उत्पादक श्रम नही करता तो वह समाज का और दूसरे श्रम करने वाले का शोषण करता है । हर ब्यक्ति को कम से कम अपने जीवन सम्बन्धी ब्य्कतिगत काम जैसे अपने कमरे , कपडे आदि को ब्यवस्थित और साफ रखने में किसी दूसरे की सेवा नही लेनी चाहिए । वैसे कम से कम आदेश देना और कम से कम सेवा लेना उच्च ब्यक्तित्व का सूचक है । इस प्रकार का जीवन स्वावलंबन और स्वतंत्रता का उत्तम आदर्श है ।
सादगी , स्वावलंबन और शारीरिक श्रम , पूर्व में कहे गए , अस्तेय और अपरिग्रह व्रतों की आधारशिला है । शारीरिक श्रम , अचौर्य / अस्तेय और असंग्रह / अपरिग्रह साधने में महत्वपूर्ण साधन का कार्य करता है । गाँधी जी अपने आश्रम में इन सभी व्रतों का स्वयं पालन करते थे और सभी आश्रम वासियों को पालन करने को उत्साहित करते थे ।

Friday, October 23, 2009

५ - असंग्रह

असंग्रह या अपरिग्रह आवश्यकता से अधिक धन ,संपत्ति , जीवन -सुबिधाओं का निषेध है , इस व्रत का विधायक स्वरुप त्याग है । सम्पूर्ण त्याग तो संभव नही है अतः जितनी अनिवार्य आवश्यकता हो , जीवन की दक्षता और शारीरिक क्षमता को बनाये रखने के लिए , उतने का ही प्रयोग और संग्रह अपेक्षित है । अपनी क्षमता के अनुसार दूसरे ब्यक्ति और शेष समाज के लिए त्याग करना ही अपरिग्रह की आत्मा है ।( कृपया , सिबि , दधीचि, बलि , कर्ण और बिलगेट्स के जीवन -दृष्टान्त का अवलोकन करें ) उल्टे आवश्यकता से अधिक संग्रह करना , जमाखोरी , अब्य्व्स्था और सामजिक दुराचार की जननी है ।
मनुष्य को पृथ्वी पर वह सब उपलब्ध हो सकता है जिसकी उसे आवश्यकता है परन्तु यदि उसे लालच है तो उसकी पूर्ति तो तीन लोक भी नही कर सकते ।
हर ब्यक्ति को अपनी आवश्यकता से अधिक रखना अर्थात संग्रह करना मनुष्य की मूल- प्रवृत्ति है परन्तु यह संग्रह एक निश्चित अनुपात में होना चाहिए और शेष ,अतिरिक्त को दूसरे ब्यक्ति को जिसे उसकी आवश्यकता हो दान कर देना चाहिए अथवा राज्य / समाज को लौटा देना चाहिए । अपनी कमाई हुई संपत्ति , ज्ञान , बल , बुद्धि आदि का आधिक्य के कारण दूसरे के लिए त्याग करना ही असंग्रह है । यदिहम अपरिग्रह का पालन करें तो समाज में किसी को किसी बस्तु की कमी न रहे और पूँजीबादी ब्यवस्था तथा शोषण का अंत हो जाय । इसके लिए संघर्ष नही अपितु मनुष्य के विचारों में परिवर्तन लाना होगा जो कठिन तो है परन्तु असंभव नही है । करना तो यही होगा क्योंकि यही अहिंसा का सुविचारित मार्ग है । बस्तुतः मनुष्य की नैतिक उन्नति ही सामाजिक ब्यवस्था की उन्नत अवस्था है । समाज को उन्नत करने के लिए ब्यक्ति को ही उन्नत करना होगा । ब्यक्ति ईकाई है और समाज ब्यक्तियों का समूह ।
संग्रह की जड़ में लालच है और है ,असुरक्षा का भाव , जिसे शिक्षा द्वारा दूर करना होगा । लालच के लिए संतोष और असुरक्षा के लिए ईश्वर / नियति / प्रकृतिपर भरोसा लाना होगा । मनुष्य का नैतिक उत्थान और सामाजिक सहयोग का भाव ही असंग्रह प्रवृत्ति का सहज संधान है । मनुष्य को सीखना होगा कि त्याग का जीवन कितना सुखी और आनंदमय होता है । भारतीय अर्थ - शास्त्री प्रो ० जे ० के० मेहता के '' थियरी आफ वांटलेसनेस '' को जीवन में अपनाना होगा ।
'' बिन संतोष न काम नसाहीं । काम अछत सुख सपनेहु नाही ॥
और,
'' कोऊ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिन । जल बिनु चलै कि नाव कोटि जतन पचि-पचि मरिय ॥ ''
(रामचरित मानस )

४ - ब्रह्मचर्य

एकादश व्रतों में ब्रह्मचर्य चौथा और अति प्रमुख व्रत है । बिना ब्रह्मचर्य के अहिंसा और सत्य की साधना संभव नही है । ब्रह्म का अर्थ सत्य /ईश्वर या परम आत्मा से है और ब्रह्मचर्य का अर्थ है ऐसे रास्ते पर चलाना जों सत्य की और जाता हो । एक नियामक है , जों सम्पूर्ण जगत को चलाता है और मनुष्य को उसी नियामक के अनुसार अपना जीवन ले चलना चाहिए , उसके विपरीत चलने से ब्रह्मचर्य की अवहेलना होती है और हम सत्य- जीवन तथा जीवन- मार्ग से च्युत हो जाते हैं । ( वेदों में ऋत नाम की एक नियामक शक्ति का उल्लेख है जों सम्पूर्ण जगत में ब्यवस्था कायम रखती है - '' ऋतस्य यथा प्रेतः '' यानिकि ऋत के अनुसार ही चलो । पुनश्च , ब्रह्मा को भी विधि नाम दिया गया है , विधि का अर्थ भी नियम ही होता है , सो ब्रह्मा कोई ब्यक्ति नही , नियम ही है जिसके अर्न्तगत विश्व की रचना हुई है )
अपने इन्द्रियों पर संयम रख कर जीवन जीना ही ब्रह्मचर्य का पालन करना है । हमारे विचारों का हमारे इन्द्रियों पर सदैव नियंत्रण होना चाहिए और इन्द्रियों का उपयोग उनके, उनके अर्थों / विषयों में मर्यादित तथा नैतिक नियमों के तहत होना चाहिए । यौन सम्बन्ध संतानोत्पत्ति हेतु और किंचित शारीरिक आनंद के लिए भी वर्जित नही है परन्तु यह सम्यक और मर्यादित हो । सामाजिक नियमों , नैतिक नियमों तथा स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन नही होना चाहिए । (बुद्ध और जैन धर्म भी सम्यक आहार -विहार और जीवन में मध्यम मार्ग का अनुमोदन करते हैं । योग में तो पञ्च -यमों में ब्रह्मचर्य का चौथा स्थान है । वीर्य -रक्षा , मनुष्य में तेज , बल , बुद्धि , मेधा , ओज और ऐश्वर्य की वृद्धि करता है , इसमें तनिक भी संदेह नही है )
इसी प्रकार सभी इन्द्रियों को उसी उसी कर्मों में रत करना चाहिए जों श्रेय / सत्य की और ले जाते हों और उन सब का निषेध करना जों अन्यथा सत्य के विपरीत पतन की और ले जाने वाले हों । इस प्रकार के कुछ थोड़े लोग भी यदि तैयार हो सकें तो पूरे समाज को शीक्षित और समझा कर उन्नत कर सकते हैं । ( गीता में भी श्री कृष्ण मनुष्य को इन्द्रियों को जीतने के लिए कहते हैं , जों हाथी की तरह प्रमत्त हैं और आसानी से मनुष्यों को अपने विषयों में खीँच ले जाती हैं , इन्हे संयम से रोकना चाहिए )
गाँधी जी के अनुसार ब्रह्मचर्य के बिना सदगुणों और नैतिक नियमों को नही साधा जा सकता और न तो सत्य , न्याय , अहिंसा और सत्याग्रह के क्षेत्र में सफलता ही हासिल की जा सकती है । जिसका अपने इन्द्रियों पर संयम नही है , वह दूसरे को प्रभवित कैसे कर सके गा ? महावीर और विजयी वही हो सकता है , जिसने अपने ऊपर विजय प्राप्त कर लिया हो । (इसी कारण जैन तीर्थंकर को महावीर कहा गया है । )
'' हमको ऐसी शक्ति देना मन विजय करें । दूसरों की जय के पहले ख़ुद की जय करें ''

Wednesday, October 14, 2009

३ - अस्तेय

अस्तेय का अर्थ चोरी न करना है । चोरी का अर्थ किसी दूसरे की संपत्ति , साधन , बुद्धि ,कौशल को बिना उसकी अनुमति के या जानकारी के तथा स्वीकृति लिए बिना लेना , उपयोगमे लाना और उसपर अपना स्वामित्व स्थापित करना है । गाँधी जी एक दूसरे प्रकार की चोरी की बात भी कहते हैं जिसमे हम जरुरत से ज्यादा बस्तुओं का उपयोग करते है , यह चोरी ब्यक्ति से नही समाज से मानी जायेगी । सारी संपत्ति समाज और राष्ट्र की है और राष्ट्र और समाज एक ट्रस्ट के रूप में हैं ,हम एक ट्रस्टी हैं अतः ईमानदारी से हमें अपनी आवश्यकता भर की चीजों का ही उपभोग करना चाहिए और शेष समाज के अन्य सदस्यों के लिए छोड़ देना चाहिए ।
चोरी के मूल में मनुष्य की लालच है , अतः लालच का त्याग करना चाहिए। ईशावाश्य उपनिषद में भी लालच का निषेध किया गया है - '' मा गृधः '' यानि कि लालच मत करो । गीता में भी काम , लोभ और क्रोध को श्री कृष्ण ने मोह , अज्ञान और दुखों का कारण बताया है ।
साथ ही एक बात और चोरी के अर्न्तगत आती है , जब हम , हमें प्राप्त बल ,बुद्धि , कला , कौशल और सभी प्रकार कि संपत्ति को समाज के उन लोगों में नही बांटते जिनमे उन चीजों की कमी , न्यूनता या अभाव है । अर्थात हमें अपनी क्षमता और योग्यतानुसार ब्यक्ति और समाज की सेवा करनी चाहिए ॥ यदि हम ऐसा नही करते तो यह भी चोरी ही है ।
योगसूत्र में पतंजलि कहते हैं - '' जो ब्यक्ति चोरी करता है , वह जीवन भर दरिद्र ही रह जाता है परन्तु जो चोरी की भावना का त्याग करदेता है वह सदा संपन्न रहता है उसे पूरे जीवन दरिद्रता का अनुभव भी नही होता '' जो चोरी करता है , उसका नैतिक जीवन ह्रास और सामाजिक स्थिति पतन को प्राप्त होती है । राम चरित मानस में इसका वर्णन स्वामी तुलसीदास ने करते हुए कहा है - '' जिस रावण से देवता और राक्षस इतने भयभीत थे कि दिन को भोजन नही करते थे और रात को नीद भी नही आती थी वही प्रभुता संपन्न दस सिरों और बीस भुजाओं वाला रावण जब सीता को चुराने चला तो उसकी दशा एक चोर कुत्ते की तरह थी जो इधर उधर देखता हुआ घरों में घुसता है । (कृपया रामचरित मानस पढ़ें )। मनुष्य का ब्यक्तित्व चोरी से कलंकित हो जाता है ।

Tuesday, October 13, 2009

२ - अहिंसा

सत्य का साधन है अहिंसा सो यह भी सत्य और सत्यांश ही है । सत्य और अहिंसा एक सिक्के के दो पहलू हैं .सत्य सर्वोच्च सिद्धांत और अहिंसा सर्वोच्च कर्तब्य है । अहिंसा संसार की सबसे बड़ी क्रियात्मक शक्ति है जो मनुष्य को प्राप्त है । '' विनाश और मृत्यु के मध्य अहिंसा और प्रेम ही जीवन को प्रतिष्ठापित कर सकते हैं '' (प्लेटो )। हिंसा जीव का स्वभाव है और जीवन के लिए अनिवार्य भी अतः हिंसा का निषेध करना ही मनुष्य का नैतिक नियम होना चाहिए । प्रेम , करुणा , सहायता ,सहयोग और सद्भावना अहिंसा के विधायक स्वरूप है ।
मन ,वचन ,कर्म से किसी को नुकसान न पहुंचाना ;शोषण न करना ; अपमानित न करना ; न सताना ,किसी प्रकार की शारीरिक -मानसिक क्षति न पहुंचाना अहिंसा है । जिसकी मृत्यु निश्चित हो गई हो , पागल कुत्ते या बन्दर और मच्छर को अन्तिम विकल्प के रूप में सुरक्षा के लिहाज से मारना हिंसा नही है ।
अहिंसा विधायक रूप में अपने अमित्र से भी प्रेम कराती है और ऐसा प्रेम करती है जो प्रतिफल न चाहे । शत्रु से घृणा नही प्रेम ही अहिंसा की विशेषता है । शत्रुता को प्रेम और घृणा को सद्भावना से ही हटाया जा सकता है । '' मल की जायं मलाहि के धोये '' (राम चरित मानस )
अहिंसा के तीन स्तर हैं - प्रथम वीरों की अहिंसा, जिसमे शक्ति संपन्न अहिंसा को मान कर दोषी को क्षमा करता है ; दूसरी कमजोरों की अहिंसा जो सामाजिक नियमों और नैतिक नियमों के अर्न्तगत मजबूरी में अहिंसा का पालन करता है औरतीसरी कायरों की हिंसा जो प्रतिकार तो चाहता है परन्तु कर नही सकता । कायरों की अहिंसा से तो हिंसा ही श्रेष्ठ है ।
अहिंसा की ही विजय होती है क्यों कि वह सत्य ही है और सत्य की जय होती ही है । '' सत्यमेव जयते '' । हिंसा सदैव पराजित होती है , इतिहास गवाह है - घृणा मारती है , प्रेम कभी नही मरता । अहिंसा एक शाश्वत नियम है , गाँधी ने केवल इसका अपने जीवन और राजनीति तथा समाज में प्रयोग किया ।
दशरथ ने वचन के लिए ; राम ने आज्ञा -पालन के लिए , भरत ने नीति के लिए , हरिश्चंद ने सत्य के लिए , शिबि दधिची ,कर्ण और वलि ने दान के लिए , बुद्ध ने करुणा के लिए , सुकरात ने अपने वसूलों के लिए , जीसस ने प्रेम के लिए और गाँधी ने अहिंसा के लिए अपने जीवन का वलिदान किया है । सदगुण वलिदान मांगते हैं ।
गाँधी कहते हैं , अहिंसा कोई मेरा नियम नही है यह पूरे मानव जाति का शाश्वत नियम है मैंने इस पर थोड़ा चलने की कोशिस की है । देखिये - '' अहिंसा परमो धर्मः '' - जैन । '' परम धरम जग विदित अहिंसा '' - राम चरित मानस । '' हिंसा तन्निरोधे वैर त्यागः '' - योगसूत्र में पतंजलि । '' परोपकाराय पुण्याय , पापाय परपीडनम '' - व्यास महाभरत में .

Sunday, October 11, 2009

गाँधी के एकादश व्रत

गाँधी जी की सायंकालीन प्रार्थना के अंत में ग्यारह व्रत लिए जाते थे जिनका पालन करने की उम्मीद की जाती थी । इस पूरी प्रार्थना को हम बाद में लिखेंगे . इन्हे एकादश व्रत के रूप में जाना जाता है ,इनका एक एक करके हम वर्णन करेंगे जिनसे हमको गाँधी जी के विचारों को समझने में पूरीतरह मदद मिलेगी -
१- अहिंसा , २ - सत्य , ३ - अस्तेय , ४ - ब्रह्मचर्य , ५- असंग्रह , ६ - शरीरश्रम , ७ - अस्वाद , ८ - सर्वत्र - भय -वर्जन , ९ - सर्वधर्म -समानत्व , १० - स्वदेशी , ११ - स्पर्श -भावना (विनम्र व्रत निष्ठा से ए एकादश सेब्य हैं ।)
सत्य
सत्य का वर्णन हम पहले सत्य और ईश्वर के रूप में कर चुके हैं । सत्य को गाँधी जी दो स्तर का मानते हैं ; एक निरपेक्ष सत्य जों कभी किसी परिस्थिति में नही बदलता और जों साध्य है और दूसरा सत्य वह जों सापेक्ष है और साधन के रूप में प्रयुक्त होता है । यह सत्य , समय , स्थान और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होता रहता है , इसकी कसौटी परम सत्य ही है । सच बोलना , सत्य आचरण करना , सच्ची मित्रता करना , सच्चे सम्बन्धों का निर्वहन करना , सत्य निष्ठां से अपने कर्तब्यों का पालन करना और जीवन के सभी कार्यों और क्षेत्रों में सीधा और सच्चा होना परम सत्य को प्राप्त करने का साधन है । बाहर भीतर से एक सा होना सोचना और आचरण करना , जों मन में वही वाणी में और वही कर्म में जिसके हो वह सच्चा और परम सत्य के मार्ग का पथिक है । सत्य को पाने के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण कार्य है ,पूरे जीवन में पूरी निष्ठां से हर समय और हर परिस्थिति में अहिंसा व्रत का पालन । इस व्रत की चर्चा हम आगे करते हैं ।

Thursday, October 1, 2009

साध्य और साधन .

गाँधी जी साध्य और साधन में कोई भेद नही करते जिस तरह से इमैनुअल कांट कर्म और फल में अन्तर नही करते । गाँधी जी का साध्य सत्य का साक्षात्कार है और अहिंसा ही उसका साधन है । मनुष्य का उन्नत होना ही सत्य के पास पहुँचना है अतः मनुष्य भी साध्य ही है साधन नही । महान नैतिक दर्शन का चिन्तक कांट भी ठीक यही बात कहता है , '' ह्यूमन इंडिविजुअल ऐज end नाट ऐज मीन्स ''
गाँधी जी जीवन के हर क्षेत्र में साधन की पवित्रता पर पूरा जोर देते है । साधन पवित्र नही है तो साध्य कभी भी ग्रहण योग्य नही है । जों काम नही करता वह चोरी का खाता है ; आनंद जिसमे विवेक और चेतना नही है ,ब्यर्थ ही समझो ; चरित्र नही है तो ज्ञान पाने का कोई लाभ नही ; ब्यापार , बिना ईमानदारी और सेवा- भाव की नैतिकता के पाप है ; विज्ञानं की उन्नति मानवता के हित में होना चाहिए ; धर्म बिना परहित और त्याग के और राजनीति बिना धर्म और नैतिक सिद्धांतों के कोई अर्थ नही रखता । '' वैष्णव जन तो तेने कहिये जों पीर पराई जाने रे ''
'' राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहिं समर्पे बिनु सतकर्मा ॥
विद्या बिनु बिबेक उपजाए । श्रम फल पढ़ें कियें अरु पाए ॥ '' - राम चरित मानस , अरण्य कांड ।
गाँधी ज कहते है , जों ब्यक्ति एक स्थान पर ग़लत है वह दूसरे स्थान पर सही नही हो सकता । जैसे सदगुण स्वयं में अपना पूर्ण फल है वैसे ही कुकृत्य ,अपराध और पाप कर्म अपने में स्वयं परिपूर्ण हैं । '' crime like virtue are their own rewards '' और - '' सुधा सराहिय अमरता गरल सराहिय मीचु '' - राम चरित मानस ।

Tuesday, September 15, 2009

गाँधी के शिक्षा सम्बन्धी विचार

गाधी जी सभी सात से चौदह वर्ष के बालकों को अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा देना चाहते थे और इसे वे बुनियादी तालीम /शिक्षा कहते थे । इसका उद्येश्य एक अभिनव , आदर्श मनुष्य बनाना है जो एक पूर्ण नागरिक के गुणों से युक्त हो । इस शिक्षा में - १ - आर्थिक , सामाजिक , राजनैतिक -अधिकारों , कर्तब्यों की समझ का समावेश हो । २ - क्षात्र की योग्यतानुसार किसी शिल्प / कौशल /कला की शिक्षा दी जाय जो उसे स्वावलंबी बना सके । ३ - मानवीय सदगुणों की शिक्षा दी जाय जैसे सत्य , अहिंसा , प्रेम , सहयोग सर्व धर्म सम भाव आदि आदि । ४ - राष्ट्र प्रेम और अन्तर राष्ट्रिय सौहार्द्र की समझ ।
शिक्षण संस्थाएं पहले राज्यों द्वारा चलाई जायं बाद में वे उत्पादक केन्द्र हों और स्वावलंबी हों । ज्ञान को उत्पादक कार्य से जोड़ा जाय । कार्य क्षेत्र को शिक्षा केन्द्र और शिक्षा केन्द्र को उत्पादक कार्य क्षेत्र ऐसा दोनों को एक में आमेलित किया जाय । शिक्षा हर प्रकार जीवन से जुड़ी हो ।
उच्च शिक्षा उसी को सरकार दे, जिसकी जितनी जरुरत हो । सबको उच्च शिक्षा देना बेकारी बढाना है । तकनिकी उच्च शिक्षा निजी संस्थानों को देनी चाहिए जिनको ऐसे लोगों की जितनी जरुरत हो । शोध संसथान इन्ही उत्पादक संस्थानों के शिक्षा केन्द्रों में संचालित हों ।
शिक्षा का और शिक्षक का काम बालक में से वह गुण बाहर लाना है जो उसमे पहले से नैसर्गिक रूप में विद्यमान है । शिक्षा प्रक्रिया में दंड देना चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक , शिक्षक की अयोग्यता का प्रमाण है , शिक्षक को इससे विरत रहना चाहिए । शिक्षक को अपने जीवन में भी वैसा ही होना चाहिए जैसा वह क्षात्र को बनाना चाहता है ।
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Saturday, September 12, 2009

गाँधी का सामाजिक दर्शन

गाँधी का समाज -जनतांत्रिक , स्वावलंबी और स्वशासित होगा .इस समाज का प्रत्येक ब्यक्ति सब का हित चाहने वाला , स्वयं में अनुशासित , अपनी योग्यता के अनुसार काम करके खाने वाला स्वावलंबी और अहिंसक होगा । संगठित मनुष्यों के समुदाय और सहयोग पर आधारित समाज की एक छोटी ईकाई होगी जिसमे सभी उच्च मानवीय आदर्शों से युक्त होंगे । साम्यवाद के सिद्धांत से सहमत हर ब्यक्ति क्षमता के अनुसार काम करेगा और आवश्यकता के अनुसार प्राप्त करेगा और जो कमाएगा नही वह खायेगा भी नही । जो बिना कमाए / परिश्रम किए खता है , वह चोर है । सभी का जीवन सादगी और त्याग का होगा , सदगुणों से युक्त ब्यक्ति ही समाज बनाएगा सो पूरा समाज / समुदाय सदगुणी ही होगा । इसे गाँधी जी राम -राज्य के आदर्शों पर आधारित पंचायत और ब्यवस्था को पंचायती जनतंत्र कहते हैं । पंचायत की यह ईकाई अपनी सभी आवश्कताओं को पूरा कराने यहाँ तक कि सारी दुनिया से अपनी सुरक्षा कराने में समर्थ होगी । हर सदस्य को इस बात कि पूरी शिक्षा दी गई होगी कि वह अपने समुदाय के हितों के लिए मरने तक को तैयार हो ।
गाँधी का समाज अगणित ग्रामों से बना पिरामिड - संगठन नही होगा जिसके शिखर को तल से सहायता मिलती हो किंतु महासागर सा एक वृत्त होगा जिसका केन्द्र ब्यक्ति ही होगा । ब्यक्ति का उत्कर्ष ही समुदाय का उत्कर्ष है । सभी काम सहकारिता , स्नेह और त्याग के सिद्धांतों पर किए जायेंगे । सामाजिक ब्यवस्था विकेन्द्रित और न्याय पर चलेगी क्योंकि केन्द्रीकरण बिना शक्ति और हिंसा के नही चल सकती और गाँधी का समाज पूर्ण अहिंसक होगा । समुदाय पर नियंत्रण नैतिक शक्ति का होगा । संग्रह का निषेध होगा सो अमीर गरीब नही होंगे । शोषण और अनाचार कि संभावना घटती ही चली जायगी ज्यों ज्यों ब्यक्ति उन्नत और सदगुणी होता जाएगा । स्वदेशी का अर्थ है वह सब पैदा करना जिसकी हमें जरुरत हो और हम जो पैदा करते हैं उसी से अपने जीवन की आवश्यकताओं को पूरा कर लें और उतने से संतुष्ट हों अथवा उसे पैदा करने का उपक्रम करें जो बहुत जरुरी है
जाति / वर्ण ब्यवस्था नही होगी , योग्यता , क्षमता के आधार पर लोग कम करेंगे और आवश्यकता के आधार पर उनको दिया जायेगा । परिश्रम चाहे वह जूता बनाने का हो या शिक्षक का या वकील या मुखिया का , सब का बराबर आदर होगा , जो ज्यादा समर्थ और विशेष रूप में किसी योग्यता / क्षमता में दक्ष और कुशल है , वह स्वेच्छा से बिना किसी मूल्य के ब्यक्ति और समाज को देगा और मदद करेगा ।
समाज / समुदाय / पंचायत एक ट्रस्ट की तरह होगा और सबको अपनी आवश्यकता के अनुसार ही भोग करने की अनुमति होगी यानि कि अपरिग्रह / असंग्रह का नियम सब पर स्वच्छा से लागू रहेगा । कृषि की प्रधानता होगी , छोटे उद्योग रहेंगे , विज्ञानं की प्रयोग -शालाएं गावों में होंगी , छोटे यंत्रों का प्रयोग होगा जो मनुष्य के श्रम को कम करें , मनुष्य के जीवन को सरल , सुखी और संपन्न बनने की खोजें जरी रहेंगी ।
सत्य होगा , सत्य के लिए सत्याग्रह होगा और अहिंसा , प्रेम , करुणा , सहयोग से युक्त एक बड़ा परिवार ही गाँधी के समाज की परिकल्पना है । समाज का ब्यक्ति अलग परन्तु अंतरात्मा एक ही होगी । आत्म संयम और आत्मोन्नति यही समाज का चरम लक्ष्य होगा ।

Friday, September 11, 2009

गाँधी का राजनैतिक दर्शन

राजनीति को अध्यात्मिक तथा नैतिक मूल्यों के बिना चलाना और हिंसा का प्रयोग गाँधी जी को मान्य नही था । साथ ही साथ वे राजनीति को धर्म के साथ जोड़ कर देखना चाहते थे । पाश्चात्य राजनीति प्रजातंत्र की आड़ में फासीवादी और सम्राज्यवादी है । रंग भेद की नीति अमानवीय है और सबकी स्वतंत्रता और संप्रभुता की इज्जत होनी चाहिए । आर्थिक असमानता और शोषण मानव जाति के लिए कलंक हैं ।
गाँधी जी ब्यवहारिक तौर पर थोडी सेना रखने के समर्थक और विश्व शान्ति तथा नीरश्त्रीकरण के पक्षकार थे । सर्वभूत हित के सिद्धांत और सर्वोदय का विचार जो ट्रस्टीशिप के सिद्धांत पर आधारित है , गाँधी जी की प्रमुख सामाजिक ब्यवस्था की परिकल्पना है , वे बहुमत के कल्याण के सिद्धांत ( लाक ) के खिलाफ हैं । वे वर्तमान राज्य जो हिंसा और शक्ति के केन्द्र बने हुए हैं, को , उचित शिक्षा द्वारा आदर्श राज्य में बदले जाने चाहिए , जहाँ हिंसा और शक्ति का प्रयोग शून्य की तरफ़ इंगित करता हो । उनका समाज एक अराजकतावादी राम राज्य होगा जहाँ न सेना होगी न अस्पताल न न्यायालय परन्तु सभी कार्य मानव स्वभाव की गुणवत्ता से स्वयं संचालित होते रहेंगे ।
गाँधी का सत्याग्रह का विचार सत्य की स्वाभाविक एवं सार्वभौमिक आधारशिला पर प्रतिष्ठित था जिसके अनुसार सत्य एवं ईश्वर एक ही हैं । सत्याग्रह , अन्याय , जबरदस्ती , शोषण और अनाचार के खिलाफ आत्मा की पवित्र आवाज को निर्भय होकर प्रकट करना है । सत्यग्रह अमानवीय दुराचरण का अहिंसक प्रतिरोध है । सत्याग्रह , ब्यक्ति , समूह और सरकार के विरुद्ध प्रयुक्त किया जा सकता है । यह मानव का स्वाभाविक , जन्म सिद्ध अधिकार है । सत्याग्रह की शीक्षा परिवार से ही प्रारम्भ हो जाती है ।
गाँधी जी आत्मा की उच्चता और पवित्रता में आस्थावान थे , जो आत्मा के अनुकूल न हो उसका विरोध करना होगा । वे बहुमत नही सर्व मत के समर्थक थे और सांसद के बहुमत के निर्णयों के विरोधी । एक ब्यक्ति भी यदि किसी बात पर विरोध में है तो उसके विरोध को पूरा पूरा सम्मान और महत्व देना चाहिए । बुरे के विरोध में उठना हर आदमी का पवित्र कर्तब्य है और संसद यदि ठीक से काम न करे तो उसे भंग करदेना देश के हित में है ।
राष्ट्रीयता , अन्तर- राष्ट्रीयता का साधन है । राष्ट्र एक इकाई है और विश्व एक संयुक्त -राष्ट्र । सभी देशों की आर्थिक , राजनैतिक , सामाजिक , शक्षिक और रंगभेद रहित समझ को बराबरी और समरसता के बौद्धिक स्तर पर लाना आज की पहली मांग है । जबतक पूर्ण विश्व में पूर्ण शान्ति न हो एक विश्व -शान्ति सेना हो.
स्वतंत्रता के हामी और राज्य की सेवा द्वारा सर्व समाज का कल्याण उनका मूल मन्त्र है । सभी ब्यक्ति , समूह और राष्ट्र को स्वतंत्र होना ही चाहिए जिससे वे अपना अपना विकास कर सकें ।
अपराधी को जेल में रख कर उनका सुधार करना होगा सो यह जेल नही सुधर गृह ही कहा जाए । अपराधी को सहानुभूति , सुख सुबिधा के साथ अपराध के होने और करने के कारणों का निदान और उपचार करना चाहिए । न्यायालय का पूरा ध्यान दंड पर नही सुधार पर हो और ऐसा सब कुछ किया जन चाहिए जिससे अपराधी के भीतर का आदमी बाहर आ सके । गाँधी जी एक अहिंसक सेना संगठन में विश्वास रखते थे । न्याय में बिलम्ब बहुत बड़ा अन्याय है जिसका जिम्मेदार राज्य और न्याय ब्यवस्था है , प्रायः न्याय उसको मिलता है जो बड़ा वकील अपने पक्ष में खड़ा कर सके , गरीब को इस तरह न्याय कभी कभी ही मिल पाता है ।
राज्य के नेताओं औरधिकारियों को ब्य्कतिगत जीवन में निहायत इमानदार , परोपकारी , सरल और सादा जीवन -उच्च विचार का पालन करने वाला होना चाहिए और जिसमे त्याग , करुना और देश-भक्ति कूट कूट कर भरी हो ,। भ्रष्ट और अयोग्य नेता अधिकारी को कठिन दंड देकर तुंरत सत्ताच्युत कर देना चाहिए ।

गाँधी की दृष्टिमे आत्मा

आत्मा वह तत्व है जो ईश्वर से सम्बंधित है । अतः सभी आत्माओं में एकत्व है । मनुष्य के शरीर भले भिन्न भिन्न हों पर सबकी आत्मा एक ही है । यह ब्यक्तिगत आत्मा ईश्वर का ही छोटा अंश है , जैसे सागर का एक बूंद । आदमी का ध्येय ईश्वर से संयोग है , जब वह अपनी एक बूंद होने की समझ / अंहकार गलाकर सागर में मिलने का पात्र हो जाय । जीव तो अलग अलग और भिन्न हैं पर आत्मा एक है सो सबके उद्धार के बिना एक का उद्धार ब्यर्थ ही है ,अतः सबको , सबका भला करना चाहिए इसी में ब्यक्तिगत हित निहित है ।
मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है , वह आत्मा शरीर पर निर्भर नही है । एक ब्यक्ति का विकास सबका विकास और उसका पतन सबका पतन है । मानवता और यहाँ तक पूरी सृष्टि एक ही ईकाई है और इन सब में आत्मा की शक्ति महानतम है । इस अपनी ब्यक्तिगत आत्मा को पूर्ण बनाने के लिए और परम आत्मा से मिलने के लिए अहिंसा का पूर्ण पालन अनिवार्य है ।
गाँधी की आत्मा सम्बन्धी अवधारणा , गीता और उपनिषदों में वर्णित जीव / आत्मा / परमात्मा की अवधारणा से उदभूत है । राम चरित मानस की चौपाई गाँधी का मूल कथन है - '' ईश्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥ ''

गाँधी के ईश्वर .

ईश्वर एक ऐसी विशिष्ट शक्ति और परम सत्ता है जो परिभाषा से परे और प्रत्यक्ष से बाहर है परन्तु अनुभव गम्य है । परमात्मा की परिभाषा असंख्य और उसकी विभूतियाँ अनन्त हैं ; वह अवर्णनीय और अरूप तथा अज्ञात है ; वह सबमें सदैव बराबर बराबर अनुपात में ब्याप्त और अनुस्यूत है । ईश्वर सत्य है और सत् का अर्थ है , होना ; जो कुछ भी अस्तित्व में है वह सब ईश्वर ही है उसके परे कुछ भी नही । सो सत्य परमात्मा और परमात्मा सत्य है। वह कर्ता , अकर्ता और अन्यथा दोनों से परे भी है ; वह श्रष्टा , पालन कर्ता और न्याय कर्ता भी है । युवा अवस्था में उन्हें ज्ञात था कि , ईश्वर सत्य है परन्तु १९२९ में एक कदम और बढ़ कर उन्हों ने कहा , ' सत्य ही ईश्वर है ' ।
ईश्वर सम्बन्धी भारतीय धारणा इतनी व्यापक और सूक्ष्म है कि उसे ब्यक्त करना सरल नही है । वह अनन्त पूर्ण निरपेक्ष है , सब से परे है । उसकी परिभाषा अस्वीकृति के लिए ही प्रस्तुत की जाती है । ** नेति , नेति ** परन्तु हिंदू धर्म में उसके साकार रूप की अवधारण भी मानी है जो सुसंगत और समन्वयबादी है । वास्तव में ईश्वर की आस्तिक धारणा मनुष्य की गंभीरतम दार्शनिक अंतर्दृष्टि की परंपरागत अभिव्यक्ति है । ईश्वर ब्यक्ति नही शाश्वत नियम है ( वेदों में वर्णित ऋत ) परन्तु प्रार्थना के लिए तो साकार , ब्यक्ति रूप में ईश्वर चाहिए । वह हमें सदा अच्छे जीवन के लिए चेतावनी देता रहता है और भयंकर न्यायकर्ता और दंडाधिकारी भी है ; वह हमारे साथ वही करता है जो हम पड़ोसियों के साथ करते हैं और इस मामले में ईश्वर के साथ अज्ञान का कोई बहाना नही चलता । वह भूल सुधार का अवसर देता है , अन्यथा दण्डित भी करता है , ऐसा गाँधी जी का ब्यक्तिगत अनुभव है ।
गाँधी जी कहते हैं , '' मैं अपने छाती पर हाथ रख कर कह सकता हूँ कि मैं ईश्वर को एक क्षण के लिए भी भूलता नही । '' वह गरीबों और जरुरतमंदों की मदद करता है । ईश्वर प्रेम , न्याय , समानता ,नैतिकता और अन्तिम रूप में सत्य का पर्याय है ।

Thursday, September 10, 2009

Wednesday, September 9, 2009

गाँधी - राजनीति और धर्म

गाँधी के अनुसार बिना धर्म के राजनीति नही चल सकती है और न तो धर्म के बिना कोई समाज ब्यवस्थित रह सकता है । धर्म समाज की नीवं है । सार्वजानिक जीवन के मूल में नितांत धार्मिक चेतना और धार्मिक हेतु नीहित है । गाँधी का राजनैतिक दर्शन और उनकी कार्य पद्धति वस्तुतः उनके धार्मिक और नैतिक सिद्धांतों के निष्कर्ष हैं । राजनीति और समाज धर्म के बिना आत्मा रहित शरीर के सामान ही है ।
धर्म से तात्पर्य किसी विशेष धर्म से न होकर ऐसे धर्म से है जो सभी धर्मों के नैतिक नियमों से मेल खता हो और जिसमे सभी के कल्याण के नियम हों । धर्म मानव स्वभाव का वह स्थायी तत्व है जो मानवता के कल्याण और उसकी पूर्ण अभिब्यक्ति के लिए बड़े से बड़े त्याग को तैयार हो। गाँधी जी के अनुसार ऐसा कोई भी धर्म नही है जो मनुष्य को और उसके धार्मिक जीवनको सार्वजनिक जीवन से अलग करे। '' मै पहले एक धार्मिक ब्यक्ति हूँ और तब राजनैतिक या सामाजिक । '' जीवन का लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार है परन्तु इससे वह समाज और राजनीति को छोड़ नही सकता । ऐसा तो हो ही नही सकता कि कोई धार्मिक ब्यक्ति राजनीति और समाज के कार्यों में भाग न ले औरबिना धर्म के कोई कैसे जिंदा रह सकता है . सर्वभूत हित ही मनुष्य का प्रयास होना चाहिए और यह कम अहिंसा द्वारा स्थापित राज्य में ही संभव है। जो कहते हैं धर्म का राजनीति से कोई सम्बन्ध नही है वे न तो राजनीति जानते हैं और न ही धर्म ; जो समाज और देश को प्रेम नही करता और जो समष्टि का हित नही समझता , वह न राजनीति के योग्य है और न धर्म का जानकार ।
गाँधी जी हिंदू धर्म को मानते थे और उनका कहना है कि हिंदू धर्म का उद्येश्य सत्य को जानना है और इस बात से और धर्मों का कोई विवाद नही है न तो सार्वभौमिक नैतिक नियमों पर ही अन्य धर्मों से मतभेद है । सत्य और ईश्वर , प्रेम और अहिंसा , ब्यक्ति और समष्टि हित तो सभी धर्मों का मूल है । धर्म बस्तुतः नैतिक आधार पर सामाजिक समझौते का नियमन है । आदमी के कई जीवन बँटे हुए नही होसकते और धर्म तो उसके जीवन का वह आधार है जिससे उसकी सभी गतिविधियाँ प्रेरित और नियंत्रित होती हैं । धर्म के बिना राजनीति तो रावण की थी ; राम -राज्य तो धर्म से ही चलेगा ।

Wednesday, September 9, 2009

गाँधी को प्रभावित करने वाले तत्व

गाँधी जी को प्रभवित करने वाले धर्म , पुस्तकें , महापुरुष और विचार निम्नवत थे ।
पुस्तकों में गीता का स्थान सर्वप्रमुख है । गाँधी जी प्रति दिन प्रायः गीता का पाठ करते थे और उसपर कई टीकाएँ भी पढीं थीं .उनकी सायंकालीन प्रार्थना में गीता के द्वितीय अध्याय के हिन्दी अनुबाद का पाठ शामिल था , जिसमे स्थित -प्रज्ञा के लक्षण कहे गए हैं । गीता के सम्बन्ध में उन्होंने कहा ''यद्यपि मै इसाई धर्म की बहुत सी बातों का प्रशंसक हूँ तथापि मै अपने को कट्टर इसाई नही मान पाता । हिंदू धर्म जैसा मै उसे जानता हूँ वह मुझे पूरी तरह से संतुष्ट करता है और जो शान्ति मुझे उपनिषद और गीता में मिलाती है वह ईसामसीह की पर्वत - शिक्षा से किसी तरह कमतर नही लगती । जब मै संशय और निराशा से घिरता हूँ तो गीता की तरफ़ देखता हूँ और मुझे समाधान मिल ही जाता है । गीता की मूलभूत शिक्षा इस बात के खिलाफ है कि मुक्ति और सांसारिक जीवन के बीच कोई सीमा रेखा खींची जाय । गीता का आदर्श पुरूष स्थित्प्रग्य , विनम्र और करुणामय है ; वह सुख - दुःख और राग - द्वेष से मुक्त है , उसका शुभाशुभ परिणाम से कोई सम्बन्ध नही , कारण वह पूरी तरह से अहिंसक है क्योंकि हिंसा कर्मफल के उपयोग की इक्षा / नियत पर आधारित है ।''
ईसामसीह की शिक्षाओं ने भी गाँधी जी को प्रेरित किया .गाँधी जी का सत्याग्रह -दर्शन का अधर और श्रोत इसाई धर्म ही है । गाँधी जी कहते हैं कि पर्वत कि शिक्षा ने ही उन्हें सत्याग्रह की उपयुक्तता और मूल्य के प्रति जागृत किया । वे पर्वत की सीख और गीता में कोई भेद नही मानते । इसाई धर्म का मूल प्रेम है और अन्य कोई भी धर्म प्रेम को इतना महान नही बनाता जितना यह क्योंकि इसाई धर्म प्रेम को ही ईश्वर मानता है । परन्तु आश्चर्य यह कि अंग्रेजों ने अपने युद्धों और सम्राज्य बादी कृत्यों से इस सिद्धांत का सदैव निषेध ही किया है । '' यह कि तुमने सुना है कि आंख के बदले आंख परन्तु मै तुमसे कहता हूँ कि बुराई के बदले भलाई और जो तुम्हे एक थप्पड़ मारे उसके सामने दूसरा गाल भी कर देना . '' और ईसा की यह प्रार्थना उनके प्रति जो उन्हें शूली पर चढा रहे थे कि '' हे पिता ! इन्हे माफ़ कर देना क्योंकि वे नही जानते कि वे क्या कर रहे हैं । ''
गाँधी जी अमेरिका के प्रसिद्द अराजकताबादी चिन्तक हेनरी डेविड थोरो से प्रभावित थे जिन्हों ने पहली बार (१८४९ में ) सविनय अवज्ञा शब्द का प्रयोग किया था और वहां की सरकार को कर देने से इंकार कर दिया था ।
रस्किन की पुस्तक ' अन्टू दिस लास्ट 'ने गाँधी को बहुत प्रेरित किया जिसके अनुसार - किसी एक ब्यक्ति का हित सभी ब्यक्तियों के हित में सम्मिलित है ; सबको जीविकापार्जन का बराबर अधिकार है ; शारीरिक परिश्रम अनिवार्य है ; नाई के कार्य का महत्व , अधिवक्ता के कार्य के बराबर है ; आत्मा परम तत्व है और मनुष्य स्वभाव से ही अच्छा और सदगुणी है ; बुद्धि की अपेक्षा चरित्र भारी है ; राजनीति और अर्थशाश्त्र में नैतिकता जरुरी है ; धनी गरीबों का सहयोग करें । इन सभी बातों में गाँधी - रस्किन एक मत थे ।
टालस्टाय गाँधी के समकालीन थे और उनका अहिंसा और प्रेम का सिद्धांत गाँधी जी के मन - माफिक था । गाँधी जी कहते हैं मेरे हिंसा को साधन के रूप में प्रयोग करने का जो दुबिधा का मन था , वह टालस्टाय की किताब ' द किंगडम आफ गाड इज विदीन यू '' पढ़ने से दूर हो गया और पूरी तरह से अहिंसा का विचार दृढ़ हो गया ।
जो भी और जहाँ से भी गाँधी जी ने सीखा और पढ़ा हो , सभी सिद्धांतों का प्रयोग , उनका अपना मौलिक ही था जैसा अभी तक इतिहास में और किसी ने किया । अंग्रेज लेखक यह मानते हैं की ईसा के उपदेशों को जिन्हें हम अंग्रेज हजारों हजारों सालों से स्वर्ग की बातें समझते रहे , पता चला कि एक भारतीय उन सिद्धांतों का प्रयोग पृथवी पर ही दक्षिण अफ्रीका में कर रहा रहा और वह भी अंग्रेजों के ही खिलाफ ।

गाँधी , एक ब्यक्ति

महात्मा गाँधी जिन्हें भारत के राष्ट्रपिता के रूप में जाना जाता है ,अध्यात्म और राजनैतिक दर्शन के कोई ब्यवस्थित , अकादमिक चिन्तक नही हैं । इस विचार से गाँधी को शंकर या कैंट की श्रेणी में नही रखा जा सकता ,अपितु बुद्ध और सुकरात की पंक्ति में निश्चित रूप से रखा जा सकता है । उनके ही अनुसार उन्होंने अपने जीवन में सत्य के साथ एक प्रयोग किया ।
गाँधी अपने को विश्व नागरिक ऐसा मानते थे । उनका संघर्ष पूरी मानवता के लिए था । बिभिनn धर्म जिनका अध्ययन गाँधी ने किया जैसे -वेदांत , इस्टोइक ,इसाई, बौद्ध , जैन , मुस्लिम और सिख आदि , सब का सार यही पाया कि अंत में सत्य की ही विजय होती है और इस विचार के विपरीत कि अपेक्षाकृत शक्तिमान की जीत होती है और वही जीवित रहता है । इसी आधार पर गाँधी जी ने राजनैतिक समस्याओं के लिए आत्मिक और नैतिक विधियों का प्रयोग किया और सफलता भी प्राप्त की । भारत की स्वतंत्रता हेतु उन्होंने वही किया जो वाशिंगटन और सन्यत्सेन ने अपने देश के लिए किया परन्तु इससे भी अधिक गाँधी जी ने राजनीति में नैतिक मूल्यों के महत्व को सिद्ध करने का युग प्रसिद्द उदहारण प्रस्तुत किया जो मानवता के इतिहास में बेमिशाल है ।
गाँधी हर ब्यक्ति को गीता में वर्णित स्थितप्रज्ञ बनाना चाहते थे और एक समाज की रचना जो सर्वोदयी -समाज हो और जिसे वे राम राज्य कहते थे जिसकी अवधारनाउन्हों ने राम चरित मानस से ली थी । वे सभी साधनों को एक ट्रस्ट के रूप में मानकर उसमे से जितनी जरुरत हो उतने का उपयोग ही करना ऐसा समाज चाहते थे । यह विचार ईशाwवास्य उपनिषद के अनुसार था कि जो कुछ जो भी है वह ईश्वर का ही है और तुम्हे अपनी आवश्यकता के अनुसार ही उपयोग में लाना चाहिए - '' तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्विद धनम् ? '' गाँधी जी का मानना था कि समाजबाद हो अथवा साम्यबादसब कुछ इस मन्त्र में समाहित था
किसी भी प्रकार कि ब्यवस्था , परिवर्तन अथवा सुधार चाहे मनुष्य में हो या समाज में , अहिंसा द्वारा ही लाया जाना चाहिए क्योंकि यही मानवोचित एवं सभ्य तथा सर्वोत्तम साधन है । मानव के विकास और उसके स्वभाव के अनुरूप मनुष्य के सद्गुणी होने में गाँधी जी को अटूट विश्वास था .

Tuesday, December 1, 2009

INDIAN WISDOM

It is our own mental attitude which makes the world what it is for us. Our thought make things beautiful, our thoughts make things ugly. The whole world is in our own minds. Learn to see things in the proper light. First, believe in this world, that there is meaning behind everything. Everything in the world is good, is holy and beautiful. If you see something evil, think that you do not understand it in the right light. Throw the burden on yourselves!  -- Vivekanand
It is unwise to be too sure of one's own wisdom. It is healthy to be reminded that the strongest might weaken and the wisest might err. -- MK GANDHI
Everything is based on mind, is led by mind, is fashioned by mind. If you speak and act with a polluted mind, suffering will follow you, as the wheels of the oxcart follow the footsteps of the ox. Everything is based on mind, is led by mind, is fashioned by mind. If you speak and act with a pure mind, happiness will follow you, as a shadow clings to a form.  -- Lord Bauddha .
Listen to the Exhortation of the Dawn!
Look to this Day!
For it is Life, the very Life of Life.
In its brief course lie all the
Verities and Realities of your Existence.
The Bliss of Growth,
The Glory of Action,
The Splendor of Beauty;
For Yesterday is but a Dream,
And To-morrow is only a Vision;
But To-day well lived makes
Every Yesterday a Dream of Happiness,
And every Tomorrow a Vision of Hope.
Look well therefore to this Day!
Such is the Salutation of the Dawn!-- Kalidas .
Live in the spirit of the teachings of the Vedas. Learn to discriminate between the permanent and the impermanent. Behold the Self in all beings, in all objects. Names and forms are illusory. Therefore sublate them. Feel that there is nothing but the Self. Share what you have,-physical, mental, moral or spiritual,-with all. Serve the Self in all. Feel when you serve others, that you are serving your own Self. Love thy neighbour as thyself. Melt all illusory differences. Remove all barriers that separate man from man. Mix with all. Embrace all. Destroy the sex-idea and body-idea by constantly thinking of the Self or the sexless, bodiless Atman. Fix the mind on the Self when you work. This is the essence of the teachings of the Vedas and sages of yore.
-- Siwanand