Sunday, February 23, 2014

भगवद गीता से -- अध्याय 12 और 13 के मुख्य विचार


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श्री भगवान कहते है , -जो लोग अपने मन को मेरे साकार रूप में एकाग्र करते है वे परम सिद्ध हो सकते हैं ।
लेकिन जो लोग अपनी इन्द्रियों को वश में करके ,समभाव रख कर उस परम सत्य की निराकार रूप में साधना करते है , जो सर्व ब्यापी , अकल्पनीय , अनुभव से परे , अपरिवर्तनीय , अचल तथा ध्रुब है , वे भी मुझे प्राप्त करते हैं ।
मेरे में अपने चित्त को लगाओ , यदि ऐसा नहीं कर सकते तो मुझे प्राप्त करने की चाह पैदा करो ।
यदि ऐसा भी नही कर सकते तो मेरे लिए सभी कर्म करके भी सिद्धि प्राप्त कर सकते हो । 12/ 2, 3 , 4, 8 , 9 , 10 , 11 , 12
अब सुनो ज्ञान और ज्ञानी के विषय में - विनम्रता , दम्भ हीनता , अहिंसा , सहिष्णुता , सरलता , योग्य गुरु का सानिध्य , पवित्रता , स्थिरता , इन्द्रिय तृप्ति हेतु विषय भोग का त्याग , अहंकार का त्याग , जन्म मृत्यु जरा रोग की अनुभूति , वैराग्य , सुत , वित् , नारि ईषना का त्याग , अच्छे , बुरे के प्रति समभाव , अकेले रहने की इच्छा , जन समूह से विलगाव , आत्म साक्षात्कार की आकांक्षा , परम सत्य की दार्शनिक खोज की जिज्ञासा और मेरे प्रति अनन्य , निरंतर भक्ति , यही ज्ञान है , शेष अज्ञान है । 13 / 8 , 9 , 10
परमात्मा सभी में ब्यप्त होकर अवस्थित है । परम सत्य जड़ जीवों में बाहर भीतर स्थित है । यह सभी में विभाजित तो लगता है पर है नही । वह अविभाजित एक रूप में सब जड़ ,जीवों में स्तिथ है ।
वही देखता है जो परमात्मा को सब में और सब में उस परमात्मा को देखता है । 13/ 14 , 16 , 17 , 28.

भगवद् गीता से {13 , 14 अध्याय }



त्रिगुणात्मक प्रकृति
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प्रकृति का परिवार (सांख्य दर्शन ) इस प्रकार है - पञ्च महाभूत - पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु तथा आकाश , फ़िर अब्यक्त तिन गुण , मन बुद्धि अंहकार ;पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ , पञ्च कर्मेन्द्रियाँ , पञ्च विषय -गंध , स्वाद , रूप , स्पर्श तथा ध्वनि सभी 24 हैं । 13/ 7
भौतिक प्रकृति तीन गुणों से युक्त है , सत , रज तथा तम ।
सत हल्का , प्रकाश कारी , सुख तथा ज्ञान का भाव रखता है ।
रज गत्यात्मक है
और तम प्रमाद , निद्रा और आलस्य से युक्त है ।
सत से सुख , रज से कर्म और तम से अज्ञान पैदा होता है।
इन तीनों में कभी सत तो कभी रज और कभी तम एक दूसरे को परास्त करके प्रधान हो जाते हैं । इस प्रकार श्रेष्ठता के लिए निरंतर स्पर्धा होती रहती है .
सत से ज्ञान , रज से लोभ और तम से अज्ञान , प्रमाद और मोह पैदा होता है ।
सतोगुणी उर्ध्वगामी , रजोगुणी मध्यगामी और तमोगुणी अधोगामी स्वभाव के होते हैं ।
जो मनुष्य इन तीनों गुणों को पार कर जाता है , वही जीवन में आनंद भोग करता है ।
जो यह जन लेता है कि यही तीनों गुण कर्म कराते हैं वह त्रीगुनातीत कहा जाता है । वही स्थिरप्रज्ञ ऐसा माना जाता है । वही अपने वास्तविक स्वरुप को जान पता है । ''
- गीता 14/ 5,6,7,8,9,10,17,20,21,22,23,24,25

भगवद् गीता के 16 वें अध्याय में कहे भगवान् कृष्ण के प्रमुख विचार


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निर्भयता , अध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन , दान , आत्मसंयम , यज्ञ परायणता , वेदाध्ययन , तपस्या , सरलता , सत्य , अहिंसा , अक्रोध , त्याग , शान्ति , छिद्रान्वेषण ( निन्दा ) में अरुचि , करुणा , लोभहीनाता , भद्रता , लज्जा , संकल्प , तेज , क्षमा , धैर्य , पवित्रता , इर्ष्या तथा सम्मान से मुक्ति , ऐ सारे दिव्य गुण हैं । 16 / 1 , 2 और 3 ।
दर्प , दंभ , अभिमान , क्रोध , कठोरता तथा अज्ञान ऐ आसुरी स्वभाव हैं । इन्द्रियों की तुष्टि ही इनकी मूल मांग है .ऐसे लोग जीवन भर काम, क्रोध और लोभ में रत रहकर अपार चिंता से जन्म से से मरण काल तक धन संचय / संग्रह में लगे रहते हैं । आज इतना है कल तक इतना और कमा लूँगा , वह मेरा शत्रु है , मैंने उसे मार दिया है , और अन्य शत्रुओं कोभी मार दूंगा , मै इन सब बस्तुओं का स्वामी हूँ , मै ही भोक्ता हूँ , मै सबसे शक्तिमान , सुखी और धनी हूँ , मेरे पास कुलीन सम्बन्धी हैं , मै यज्ञ करूँगा , दान दूंगा , आनंद मनाऊँगा । ऐसा सोचने वाले मोहग्रस्त और अज्ञानी हैं ॥ कभी कभी नामके लिए यज्ञ करते हैं , दान देते हैं , भगवान् से इर्ष्या और वास्तविक धर्म की निंदा तथा अवहेलना करते है । काम क्रोध और लोभ इनके महामार्ग हैं । इस प्रकार जो शास्त्रों और धर्म की अवहेलना करता है , न तो सिद्धि , न सुख और न तो परम गति को प्राप्त कर पाता है ।16/ 4 , 11 , 12 , 13 , 14 , 15 , 17, 18 , 21 और 23 ।

भगवद गीता के १८ वें अध्याय में भगवान् कृष्ण द्वारा कहे गये प्रमुख वचन



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सतोगुणी - बुद्धि जानता है - क्या करना और क्या नहीं करना , किससे डरना किससे नहीं डरना , क्या बंधन है और क्या मोक्ष है ।
जो बुद्धि धर्म अधर्म , करणीय अकरणीय और सत असत में भेद नहीं कर पाती है , वह राजसी है ।
जो अधर्म को धर्म और असत को सत तथा अकरणीय को करणीय जानता है वह तामसी है । १८/ ३०,३१ ,३२ ।
जो पहले विष जैसा और अंत में अमृत जैसा है , वही श्रेय है , सात्विक सुख है ।
जो सुख इन्द्रियों द्वारा उनके विषयों के संसर्ग से , प्रारम्भ में अमृत सा अंत में विष सा लगता है , वह राजसी सुख है ।
जो सुख आत्मसाक्षात्कार के प्रति अंधा है , मोह , निद्रा , आलस्य , प्रमाद से ही शुरू होकर दुःख में ही अंत करता है वह तामसी सुख कहलाता है । १८/ ३७, ३८ , ३९ ।
जो अपने नियत कर्म को करता है वह सिद्ध हो सकता है ।
सभी कर्मों में कोई न कोई दोष होता ही है , अतः अपने अपने नियत कर्म को करना ही सर्वोत्तम है । १८/४५, ४८ ।
समस्त प्रकार के धर्मों की चिंता छोड़ मेरे ही शरण में आ जाओ , मै तुम्हे समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा , चिंता मत करो । सारे कार्य के लिए मुझ पर निर्भर रहो , मेरे संरक्षण में सदा कर्म करते रहो और मेरी भक्ति में ही सदा सचेत रहो ।
मै तुम्हारे योग (साधना का शुभारम्भ ) और क्षेम (साधना की सुरक्षा और कल्याण /साध्य की प्राप्ति ) का वहन करूंगा । १८/५७, ६६।
सो सदैव मेरा चिंतन करो , मेरे भक्त बनो , मुझे नमस्कार करो , अपने नियत कर्म करते हुए निश्चिंत हो जाओ , मै तुम्हे वचन देता हूँ ।

चरैवेति , चरैवेति


चरैवेति , चरैवेति ( चलते रहो , चलते रहो ।) जीवन में इस सूत्र का अनुपालन बहुत महत्व का है । कहावत है , जहाज अगर किनारे ही खड़ा रहे तो सुरक्षित ही है परन्तु उसे तो सागर में दूसरे किनारे तक जाना ही है और यही उसका मनतब्य है । लोग डूबते रहे हैं , परन्तु तैरने का मनसूबा कम नहीं होता , और नाव और जहाज और तैरने वाले सागर में , नदी में उतरते ही रहे हैं । मंजिल सबको नहीं मिली तो क्या रास्ते तो चलते ही रहे और राही भी बढ़ते ही गए , नए रास्ते खोजे जाते रहे । परीक्षाओं में लोग फेल होते रहे तो क्या परीक्षा में बैठना तो बंद नहीं हुआ । हारने पर , जीतने का हौसला बढ़ता ही गया ।
कहां हादसे नहीं हुए , रेल में , सड़क पर , वायुयान में पर हमारी यात्रा चाँद तक पहुंच चुकी है , आगे का इरादा है । मौत के सागर में जिंदगी तैरती रही है और आगे न डूबने का पक्का इरादा है ।
सागर ( दुनिया ) मौत और जिंदगी का अजीब खेल है । न डूबने का इरादा , तैरने वाले का है और तैरने वाले का डूबना पक्का ही समझो । जो पानी में नही उतरता वो डूब भी नही सकता । नाव तो जल में ही चलेगी । जो भी जीवन पा चुका, इस संसार में वह उतर ही गया, पानी में और अब तो तैरना भी है और डूबना भी , तैर कर । इसी से हमारे यहाँ इस दुनिया को भवसागर कहा गया है । चलना ही मंजिल है , जब तक जीवन है , चलना होगा । हम यात्री हैं और यात्रा ही हमारा परम ध्येय है , चलना ही श्रेय है , सो कहा है , -- चलते रहो , चलते रहो । इसी इरादे को जीने की तमन्ना कहते है , इसके लिए हमें डूब कर तैरना सीखना है और तैर कर डूबना । इसी विरोधाभासी यात्रा को जीवन / जिंदगी कहा है । लाइफ इज लाइक दैट ।सो , धैर्य से , समझ से , हिम्मत से , हौसले से , चलते रहने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है । चरैवेति , चरैवेति ।

Friday, November 15, 2013

आलोचना , प्रशंसा और निंदा

आलोचना में दोष और गुण दोनों की  चर्चा होती है, इसका उद्येश्य सकारात्मक , सुधारात्मक , सहयोगात्मक होता है आलोचना करने वाले की नियति शुभ और कल्याणकारी होती है [ यह जरूरी , लाभकारी है ]
प्रशंशा उत्तम होती है इसमें विचार , बस्तु और ब्यक्ति के दोषो को नज़रअंदाज़ कर उनके गुणो को ही देखने की ,  परम्परा है , उत्तम ब्यक्ति मित्र-शत्रु के साथ सामान रूप से यही करते  है …ज़ैसे गांधी जी ने अंग्रेजो के गुणो की  याद दिला कर उनसे स्वतंत्रता की मांग की और बार बार अंग्रेजों को बाइबिल के सूत्र याद कराये। …एक बार किसी अंग्रेज ने उनसे पूंछा - '' आपने दुश्मनो को , आपको गाली देने वाले और आप पर अंडे फेंकने वालों को कोर्ट में क्षमा करना खान से सीखा  ? '' गांधी जी ने तुरंत उत्तर दिया - '' आप अंग्रेजों से और आपके धर्म ग्रन्थ बाइबिल से '' श्री राम और कृष्ण और अन्य भारतीय महापुरुषों के तो ऐसे सैकङों उदाहरण हैं जिनमे इन लोगों ने अपने दुश्मनों के   गुणों की   प्रशंसा  की है, और उनके कल्याण की  चिंता और अपेक्षा की ।
निंदा को तुलसी दास जी ने और   वेदों में भी   महा -पाप कहा है , - '' पर निंदा सम  अघ न गिरीसा '' .......  जो  भीतर से  रुग्ण  हैं  , मानसिक रोगी  , निकृष्ट नियति वाले  , उन्हें तो सभी विचार , बस्तु , ब्यक्ति दोषी  ही दिखता है , जो कलुषित और ऋणात्मक मानसिकता के हैं  , वे निंदा करते ही जीते और निंदा करते ही मर जाते हैं। … एक बार एक सज्जन ने न्यूटन से कहा - '' आपकी कोट में एक छेद है '' न्यूटन ने कहा - आपे दिमाक में वह छेद है  , जिसे हर जगह छेद  ही दिखेगा और कुछ न दिख सकेगा '' [ बस्तुतः श्रीष्टि में हर जगह हर विचार , बस्तु , ब्यक्ति में कुछ कमी है , होती ही है  , तो ऋणात्मक लोग उसी को खोजते फिरते  , जीते मरते हैं , पाप कमातेहै
महानता देखिये कबीर जैसा महापुरुष निंदक में भी गुण  ही देखते हैं। ....'' निंदक नियरे राखिये '' लेकि हम  तो कबीर नहीं हैं न !!!
जब हम  दूसरों की  आलोचना , प्रशंसा अथवा निंदा करते होते हैं तो  उनके विषय में उतना नहीं कह पाते जितना  खुद अपने बारे में उजागर करते हैं ( रोशा परीक्षण ) …।  आप जब हमारे बारे में कुछ कहते हैं , तो हम  आपके बारे में तुरंत उतने से ज्यादे  ही जान जाते हैं जितना आप हमको नहीं जानते होते …।निंदा और निंदक के विषय में सबसे बड़ी कटूक्ति है। …  ''सूरज पर थूकना ''


Monday, November 11, 2013

इतिहास बनाम कथा

इतिहास सत्य और तथ्य होता है , आदर्श और   नैतिक नहीं होता
कथा , नावेल /उपन्यास , पैराबल इतिहास पर आधारित होते हैं
परन्तु कथा आदि उपरोक्त सच नहीं होते , आदर्श होते है / नैतिक आचरण प्रस्तुत करते हैं
* राम , रावण ,बुद्ध , सिकंदर लाखों   होते रहते  है
एक राम  एक जीवन पद्धति और एक ,रावण , बुद्ध ,सिकंदर की कथा दूसरे  जीवन पद्धतियों की  प्रतिनिधि कथाएं होती हैं। 
यही प्रतिनिधि कथाये सभी  मनुष्यों पर लागू होती रहती हैं
प्रकृति  और परमात्मा के स्तर  पर कोई बुरा , भला और . नैतिक , अनैतिक    नहीं  होता है।  अपितु रावण राम का पूरक होता है , रावण से राम होने कि प्रक्रिया चलती ही रहती है ,    जो रावण पूरा /परफेक्ट  हो जाय  तो राम भी  समाप्त हो जांय
मनुष्य  के  स्तर पर राम  अच्छे  भले , पुण्यात्मा और रावण   बुरा , अपराधी और राक्षस है

संसार , समाज का बौद्धिक बहुमत श्री राम और बुद्ध , कृष्ण , गांधी को जीवन  आदर्श मानता  है
'' महाजनो येन गता सः पंथा। '' = बड़े लोग जिधर से जांय वही जीवन का श्रेय मार्ग है
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राम चरित मानस में तुलसीदास - [ '' तब तब धरि  प्रभु विवध शरीरा , और , '' राम अनेक अनेक नामानी '' ,  हरि  अनंत हरि कथा अनंता '' आदि आदि]