Monday, February 24, 2014

भगवद् गीता अध्याय 5 और 6 के विचार


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ज्ञानी मनुष्य , विनम्र साधु पुरूष विद्वान , गाय , हाथी , कुत्ता और कुत्ते को खाने वाले ; सभी में उसी एक परम तत्व , आत्मा को ही देखते है । जो प्रिय को पाकर हर्षित और अप्रिय को पाकर विचलित न हो , जो स्थिर बुद्धि , मोह रहित है, वह आत्मा को जनता है । 5 / 18, 20 .
अर्जित ज्ञान और अनुभव से ,आत्मा में स्थित ,जितेन्द्रिय , मिटटी और सोने को बराबर देखने वाला योगी है । जो मनुष्य निष्कपट होकर , हितैषी , प्रिय , मित्र , अमित्र , तटस्थ , मध्यस्थ , इर्ष्या करने वालों पुण्यात्माओं और पापियों को समान भाव से देखता है वह सब में उन्नत माना जाता है । 6 / 8 , 9 .
वास्तविक योगी सभी जीवों में मुझको तथा मुझमें समस्त जीवों को देखता है , और पुनः मुझे सर्वत्र देखता है , उसके लिए मै और मेरे लिए वह कभी अदृश्य नही हैं । 6 / 29 , 30 .

भगवद् गीता से --- 7 , 8 और 9 वें अध्याय के प्रमुख विचार


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हजारों मनुष्यों में से कोई एक जिज्ञासु होता है, सिद्धि के लिए और फ़िर उनमे से विरला ही सत्य को जान पाता है । मै (आत्मा) ही रस , जल , सूर्य , चंद्र , ओमकार , ध्वनि तथा मनुष्यों की सामर्थ्य हूँ । पृथ्वी में गंध , अग्नि में ऊष्मा , सभी जीवों में जीवन , तपस्वी में तप और सभी जीवों का आदि बीज हूँ । मै ही बलवान का बल और कामियों में धर्मयुक्त काम हूँ। 7 / 3 , 8 , 9 , 10 , 11।
मुझे मूर्ख  , अधम , नास्तिक और मोही नहीं जानते । मुझे आर्त ,जिज्ञासु , अर्थार्थी तथा ज्ञानी ही जानते हैं । जो भी जिन देवताओं को पूजते है  , उन्हीं देवताओं में स्थिर होकर मै उन्हें फल देता हूँ । 7 / 15 , 16 , 20 , 21।
जो ओमकार का जप करते है , जो वीतराग हैं , वे इन्द्रियों को वश में करके योग का अभ्यास करते है और प्राण वायु को सर के मध्य में केंद्रित कर समाधि को प्राप्त करते हैं । 8 / 11 , 12 ।
मै (आत्मा) ही वैदिक कर्म , यज्ञं , पितरों का तर्पण , औषधि , मन्त्र , घृत , अग्नि और आहुति हूँ । मै इस श्रृष्टि का माता पिता तथा पितामह हूँ , मै सभी वेद , ज्ञान , जानने योग्य और ज्ञाता हूँ । मै ही लक्ष्य , प्रभु , साक्षी , निवास , शरण , सुहृत ,प्रभाव , प्रलय , स्थान , निधान , इन सब का अविनाशी बीज हूँ । तप , वर्षा , जन्म , मृत्यु और सत असत भी मै ही हूँ । न किसी से द्वेष न राग , न प्रेम न घृणा ; मै सबको समान मानता हूँ ,परन्तु जो मेरी भक्ति में है , वह मुझे ज्यादा प्रिय है । कोई पापी भी मेरी शरण में आकार सुधर जाता है । मेरे भक्त का कभी विनाश नही होता । जन्म से कोई कुछ भी हो , नारी नर , उंच , नीच , पापी सभी मेरे भक्त होने के पूर्ण पात्र हैं । सो मुझे ही सोचो , मेरी शरण में आओ , मुझे ही प्रणाम करो , मेरेमय हो जाओ । 9 / 16, 17, 18 , 19 , 22 , 23 , 27 . 29 , 30 , 31 , 32 , 33 , 34 , ।

Sunday, February 23, 2014

भगवद गीता से -- अध्याय 12 और 13 के मुख्य विचार


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श्री भगवान कहते है , -जो लोग अपने मन को मेरे साकार रूप में एकाग्र करते है वे परम सिद्ध हो सकते हैं ।
लेकिन जो लोग अपनी इन्द्रियों को वश में करके ,समभाव रख कर उस परम सत्य की निराकार रूप में साधना करते है , जो सर्व ब्यापी , अकल्पनीय , अनुभव से परे , अपरिवर्तनीय , अचल तथा ध्रुब है , वे भी मुझे प्राप्त करते हैं ।
मेरे में अपने चित्त को लगाओ , यदि ऐसा नहीं कर सकते तो मुझे प्राप्त करने की चाह पैदा करो ।
यदि ऐसा भी नही कर सकते तो मेरे लिए सभी कर्म करके भी सिद्धि प्राप्त कर सकते हो । 12/ 2, 3 , 4, 8 , 9 , 10 , 11 , 12
अब सुनो ज्ञान और ज्ञानी के विषय में - विनम्रता , दम्भ हीनता , अहिंसा , सहिष्णुता , सरलता , योग्य गुरु का सानिध्य , पवित्रता , स्थिरता , इन्द्रिय तृप्ति हेतु विषय भोग का त्याग , अहंकार का त्याग , जन्म मृत्यु जरा रोग की अनुभूति , वैराग्य , सुत , वित् , नारि ईषना का त्याग , अच्छे , बुरे के प्रति समभाव , अकेले रहने की इच्छा , जन समूह से विलगाव , आत्म साक्षात्कार की आकांक्षा , परम सत्य की दार्शनिक खोज की जिज्ञासा और मेरे प्रति अनन्य , निरंतर भक्ति , यही ज्ञान है , शेष अज्ञान है । 13 / 8 , 9 , 10
परमात्मा सभी में ब्यप्त होकर अवस्थित है । परम सत्य जड़ जीवों में बाहर भीतर स्थित है । यह सभी में विभाजित तो लगता है पर है नही । वह अविभाजित एक रूप में सब जड़ ,जीवों में स्तिथ है ।
वही देखता है जो परमात्मा को सब में और सब में उस परमात्मा को देखता है । 13/ 14 , 16 , 17 , 28.

भगवद् गीता से {13 , 14 अध्याय }



त्रिगुणात्मक प्रकृति
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प्रकृति का परिवार (सांख्य दर्शन ) इस प्रकार है - पञ्च महाभूत - पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु तथा आकाश , फ़िर अब्यक्त तिन गुण , मन बुद्धि अंहकार ;पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ , पञ्च कर्मेन्द्रियाँ , पञ्च विषय -गंध , स्वाद , रूप , स्पर्श तथा ध्वनि सभी 24 हैं । 13/ 7
भौतिक प्रकृति तीन गुणों से युक्त है , सत , रज तथा तम ।
सत हल्का , प्रकाश कारी , सुख तथा ज्ञान का भाव रखता है ।
रज गत्यात्मक है
और तम प्रमाद , निद्रा और आलस्य से युक्त है ।
सत से सुख , रज से कर्म और तम से अज्ञान पैदा होता है।
इन तीनों में कभी सत तो कभी रज और कभी तम एक दूसरे को परास्त करके प्रधान हो जाते हैं । इस प्रकार श्रेष्ठता के लिए निरंतर स्पर्धा होती रहती है .
सत से ज्ञान , रज से लोभ और तम से अज्ञान , प्रमाद और मोह पैदा होता है ।
सतोगुणी उर्ध्वगामी , रजोगुणी मध्यगामी और तमोगुणी अधोगामी स्वभाव के होते हैं ।
जो मनुष्य इन तीनों गुणों को पार कर जाता है , वही जीवन में आनंद भोग करता है ।
जो यह जन लेता है कि यही तीनों गुण कर्म कराते हैं वह त्रीगुनातीत कहा जाता है । वही स्थिरप्रज्ञ ऐसा माना जाता है । वही अपने वास्तविक स्वरुप को जान पता है । ''
- गीता 14/ 5,6,7,8,9,10,17,20,21,22,23,24,25

भगवद् गीता के 16 वें अध्याय में कहे भगवान् कृष्ण के प्रमुख विचार


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निर्भयता , अध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन , दान , आत्मसंयम , यज्ञ परायणता , वेदाध्ययन , तपस्या , सरलता , सत्य , अहिंसा , अक्रोध , त्याग , शान्ति , छिद्रान्वेषण ( निन्दा ) में अरुचि , करुणा , लोभहीनाता , भद्रता , लज्जा , संकल्प , तेज , क्षमा , धैर्य , पवित्रता , इर्ष्या तथा सम्मान से मुक्ति , ऐ सारे दिव्य गुण हैं । 16 / 1 , 2 और 3 ।
दर्प , दंभ , अभिमान , क्रोध , कठोरता तथा अज्ञान ऐ आसुरी स्वभाव हैं । इन्द्रियों की तुष्टि ही इनकी मूल मांग है .ऐसे लोग जीवन भर काम, क्रोध और लोभ में रत रहकर अपार चिंता से जन्म से से मरण काल तक धन संचय / संग्रह में लगे रहते हैं । आज इतना है कल तक इतना और कमा लूँगा , वह मेरा शत्रु है , मैंने उसे मार दिया है , और अन्य शत्रुओं कोभी मार दूंगा , मै इन सब बस्तुओं का स्वामी हूँ , मै ही भोक्ता हूँ , मै सबसे शक्तिमान , सुखी और धनी हूँ , मेरे पास कुलीन सम्बन्धी हैं , मै यज्ञ करूँगा , दान दूंगा , आनंद मनाऊँगा । ऐसा सोचने वाले मोहग्रस्त और अज्ञानी हैं ॥ कभी कभी नामके लिए यज्ञ करते हैं , दान देते हैं , भगवान् से इर्ष्या और वास्तविक धर्म की निंदा तथा अवहेलना करते है । काम क्रोध और लोभ इनके महामार्ग हैं । इस प्रकार जो शास्त्रों और धर्म की अवहेलना करता है , न तो सिद्धि , न सुख और न तो परम गति को प्राप्त कर पाता है ।16/ 4 , 11 , 12 , 13 , 14 , 15 , 17, 18 , 21 और 23 ।

भगवद गीता के १८ वें अध्याय में भगवान् कृष्ण द्वारा कहे गये प्रमुख वचन



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सतोगुणी - बुद्धि जानता है - क्या करना और क्या नहीं करना , किससे डरना किससे नहीं डरना , क्या बंधन है और क्या मोक्ष है ।
जो बुद्धि धर्म अधर्म , करणीय अकरणीय और सत असत में भेद नहीं कर पाती है , वह राजसी है ।
जो अधर्म को धर्म और असत को सत तथा अकरणीय को करणीय जानता है वह तामसी है । १८/ ३०,३१ ,३२ ।
जो पहले विष जैसा और अंत में अमृत जैसा है , वही श्रेय है , सात्विक सुख है ।
जो सुख इन्द्रियों द्वारा उनके विषयों के संसर्ग से , प्रारम्भ में अमृत सा अंत में विष सा लगता है , वह राजसी सुख है ।
जो सुख आत्मसाक्षात्कार के प्रति अंधा है , मोह , निद्रा , आलस्य , प्रमाद से ही शुरू होकर दुःख में ही अंत करता है वह तामसी सुख कहलाता है । १८/ ३७, ३८ , ३९ ।
जो अपने नियत कर्म को करता है वह सिद्ध हो सकता है ।
सभी कर्मों में कोई न कोई दोष होता ही है , अतः अपने अपने नियत कर्म को करना ही सर्वोत्तम है । १८/४५, ४८ ।
समस्त प्रकार के धर्मों की चिंता छोड़ मेरे ही शरण में आ जाओ , मै तुम्हे समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा , चिंता मत करो । सारे कार्य के लिए मुझ पर निर्भर रहो , मेरे संरक्षण में सदा कर्म करते रहो और मेरी भक्ति में ही सदा सचेत रहो ।
मै तुम्हारे योग (साधना का शुभारम्भ ) और क्षेम (साधना की सुरक्षा और कल्याण /साध्य की प्राप्ति ) का वहन करूंगा । १८/५७, ६६।
सो सदैव मेरा चिंतन करो , मेरे भक्त बनो , मुझे नमस्कार करो , अपने नियत कर्म करते हुए निश्चिंत हो जाओ , मै तुम्हे वचन देता हूँ ।

चरैवेति , चरैवेति


चरैवेति , चरैवेति ( चलते रहो , चलते रहो ।) जीवन में इस सूत्र का अनुपालन बहुत महत्व का है । कहावत है , जहाज अगर किनारे ही खड़ा रहे तो सुरक्षित ही है परन्तु उसे तो सागर में दूसरे किनारे तक जाना ही है और यही उसका मनतब्य है । लोग डूबते रहे हैं , परन्तु तैरने का मनसूबा कम नहीं होता , और नाव और जहाज और तैरने वाले सागर में , नदी में उतरते ही रहे हैं । मंजिल सबको नहीं मिली तो क्या रास्ते तो चलते ही रहे और राही भी बढ़ते ही गए , नए रास्ते खोजे जाते रहे । परीक्षाओं में लोग फेल होते रहे तो क्या परीक्षा में बैठना तो बंद नहीं हुआ । हारने पर , जीतने का हौसला बढ़ता ही गया ।
कहां हादसे नहीं हुए , रेल में , सड़क पर , वायुयान में पर हमारी यात्रा चाँद तक पहुंच चुकी है , आगे का इरादा है । मौत के सागर में जिंदगी तैरती रही है और आगे न डूबने का पक्का इरादा है ।
सागर ( दुनिया ) मौत और जिंदगी का अजीब खेल है । न डूबने का इरादा , तैरने वाले का है और तैरने वाले का डूबना पक्का ही समझो । जो पानी में नही उतरता वो डूब भी नही सकता । नाव तो जल में ही चलेगी । जो भी जीवन पा चुका, इस संसार में वह उतर ही गया, पानी में और अब तो तैरना भी है और डूबना भी , तैर कर । इसी से हमारे यहाँ इस दुनिया को भवसागर कहा गया है । चलना ही मंजिल है , जब तक जीवन है , चलना होगा । हम यात्री हैं और यात्रा ही हमारा परम ध्येय है , चलना ही श्रेय है , सो कहा है , -- चलते रहो , चलते रहो । इसी इरादे को जीने की तमन्ना कहते है , इसके लिए हमें डूब कर तैरना सीखना है और तैर कर डूबना । इसी विरोधाभासी यात्रा को जीवन / जिंदगी कहा है । लाइफ इज लाइक दैट ।सो , धैर्य से , समझ से , हिम्मत से , हौसले से , चलते रहने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है । चरैवेति , चरैवेति ।